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Saturday, 8 June 2013

सहज व एकनिष्ठ प्रेम के समर्थक मधुरोपासक भक्त कवि हरिराम व्यास

सहज व एकनिष्ठ प्रेम के समर्थक मधुरोपासक भक्त कवि हरिराम व्यास
- डॉ. बहादुर सिंह परमार
अपनी आन-बान और शान के लिए विख्यात बुन्देलखण्ड वसुधा में जहाँ एक ओर आल्हा, ऊदल और छत्रसाल जैसे योद्धाओं ने जन्म लिया वहीं दूसरी ओर जगनिक, विष्णुदास, गोरे लाल, ईसुरी और हरिराम व्यास जैसे महान् काव्य प्रणेताओं ने शरीर धारण कर इस माटी का नाम सार्थक किया है । मध्यकाल में जब भक्ति की धारा समूचे हिन्दी प्रान्त में प्रवाहित हो रही थी, तब बुन्देलखण्ड के भक्तिकुंड में भी अनेक सन्त डुबकी लगाकर काव्य साधना के साथ लोक आदर्श  के केन्द्र बिन्दु बने हुए थे । ऐसे ही लोकादर्श व भक्ति शिरोमणि ब्यास का जन्म वेत्रवती सरिता के किनारे अवस्थित ओरछा नगरी में समोखन शुक्ल व देविकारानी के घर संवत 1567 की मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष 5 को हुआ था । इस विलक्षण बालक को परिवार से पुराण की परम्परा व माधव सम्प्रदाय की भक्ति भावना विरासत में मिली । हरिराम ने अपने पिता से भरपूर गुणों को ग्रहण कर पुराणवक्ता के रूप में क्षेत्र में इतनी प्रसिद्धि पाई कि उन्हें लोग व्यासजी कहने लगे । यहीं से हरिराम शुक्ल, हरिराम व्यास हो गए । बालक हरिराम कुशाग्र बुद्धि के थे, इनकी प्रतिभा से क्षेत्र में लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे । जब हरिराम व्यास लगभग बीस वर्ष की अवस्था के थे तभी  बुन्देला राजाओं ने गुढ़कुड़ार के स्थान पर ओरछा को राजधानी बनाने का निर्णय लिया जिससे नगर का चतुर्दिक विकास होने लगा । इधर राजधानी होने से राजदरबार मंे विद्वान आने लगे । आए दिन व्यासजी का विद्वानों से शास्त्रार्थ होने लगा जिसमें उन्हें विजयश्री सदैव मिलती रही । इसी क्रम में हरिराम व्यास ने काशी पहुंचकर अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ किया । काशी में उन्हें यह अनुभव हुआ कि शास्त्रार्थ और मात्र तर्क से जीवन सफल नहीं किया जा सकता है । जीवन मंे भक्ति के लिए प्रेम, सहजता, भाव प्रवणता तथा मन की एकाग्रता आवश्यक है । वहां से लौटकर वे ओरछा आए तथा बाद मंे वृन्दावन गए । उन्होंने तीर्थांटन किया, इस दौरान वे भक्त कवियत्री मीराबाई से भी मिले । वे जीवन में ओरछा व वृन्दावन आते-जाते रहे और उन्हेांने जीवन के अन्तिम क्षण वृन्दावन में ही बिताए ।
मधुरोपासक हरिराम व्यासजी द्वारा हिन्दी में रचित रागमाला, व्यासजू की बानी, रस-सिद्धान्त के पद, व्यासजू की बानी सिद्धान्त की, व्यासजी के रस के पद, व्यासजी के साधारण पद, व्यासजी की पदावली, रास पंचाध्यायी, व्यासजी की साखी तथा व्यास जी की चौरासी नामक दस ग्रन्थ मिलते हैं । इनके ग्रंथों में भारतीय संगीतशास्त्र, ज्ञान परम्परा, भक्ति साधना तथा जीवन दर्शन के विविध पक्ष गहनता से प्रकट हुए हैं । प्रेम और समर्पण के साथ सख्य भाव भक्ति के विवध रूप तथा अराध्य राधाकृष्ण की छवियांँ प्रमुखता से देखने को मिलती हैं । इनके काव्य में तत्कालीन समाज में व्याप्त तमाम विसंगतियों पर प्रहार भी दृष्टव्य है । वे जीवन में जितने सरल, निश्छल, और प्रेमी थे, उतने ही परम्पराभंजक भी थे । व्यासजी भक्त को भक्त मानते थे, वह चाहे किसी भी जाति या वर्ण का हो । जब वर्ण-व्यवस्था के तहत छुआछूत चरम पर थी तब व्यास जी इस भेद को नकारते हैं । इनसे जुड़ी एक कथा बुन्देलखण्ड में प्रचलित है जिसके अनुसार व्यास जी कुलीन और विद्वान भक्त की तुलना में अछूत भक्त का अधिक सम्मान करते थे । इस भावना से समाज के कुछ लोग उनसे चिढ़ते थे तथा कहा करते थे कि ये मात्र दिखावा करते हैं । इस भाव की परीक्षा लेने हेतु उन्होंने योजना बनाई कि व्यासजी को भंगिन के हाथ से जूठा प्रसाद सार्वजनिक रूप से खिलाया जाए । किसी मंदिर से साधु भोजन के उपरान्त एक भंगिन जूठी बची हुई सामग्री ला रहीं थी । समाज के उन चिढ़ने वाले लोगों ने उस भंगिन से व्यास जी को प्रसाद देने की बात कही । व्यास जी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई और उन्होंने सहजता से उस भंगिन द्वारा जूठन में से दी गई प्रसाद की पकौड़ी को आदरपूर्वक लेकर ग्रहण किया, जिसे देखकर वे चिढ़ने वाले लोग भी दंग रह गए । ऐसे लोगों के आचरण को हरिराम व्यासजी ने उद्घाटित किया है, जो ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर दूसरे को ठगने के लिए वेद-पुराणों का सहारा लेते हैं । जिन्हें भक्ति भाव का भान नहीं होता, वे सत्य से दूर मिथ्या को अपनाने वाले होते हैं, जो नरकगामी होते हैं । व्यासजी लिखते हैं -
बाम्हन के मन भक्ति न आवै ।
भूलै आप, सबनि समुझावै ।।
औरनि ठगि-ठगि अपुन ठगावै ।
आपुन सोवै, सबनि जगावै ।।
बेद-पुरान बेंचि धन ल्यावै ।
सत्या तजि हत्याहिं मिलावै ।।
हरि-हरिदास न देख्यौ भावै ।
भूत, पितर, देवता पुजावै ।
अपुन नरक परि कुलहिं बुलावै।।
(हरिराम व्यास,सं, वासुदेव गोस्वामी पृ. 90)
व्यासजी अपने आचरण में संत सेवा तथा भक्त सेवा को सर्वाेच्च स्थान देते रहे हैं । एक दिन की बात है कि व्यासजी के यहाँ एक साधु मंडली प्रसाद पा रही थी । व्यासजी भी उसी पंक्ति मंे बैठे भोजन कर रहे थे और उनकी पत्नी गोपी जी परोस रहीं थीं । व्यासजी को दूध परोसते समय उनके पात्र में संयोगवश ऊपर की सब मलाई जा गिरी । इस पर व्यासजी ने अपनी पत्नी   पर पंक्ति-भेद का दोषारोपण कर उन्हें साधु सेवा से अलग कर दिया । गोपी जी वास्तव में निर्दोष थी, फिर भी व्यास जी उनकी अनेक अनुनय-विनय पर ध्यान नहीं दे रहे थे । इस पर गोपी जी ने व्यासजी से पूंछा कि आखिर उन्हंे किस प्रकार से यह विश्वास हो सकता है कि किसी भेदभाव के कारण उन्हें ही मलाई नहीं परोसी गई थी ? इस प्रश्न के उत्तर में व्यास जी ने कुछ सोचकर गोपी जी से कहा कि यदि तुम अपने समस्त आभूषणों को बेचकर साधुओं का भंडारा करों तो मुझे प्रतीति हो जायेगी । गोपी जी ने इस शर्त को स्वीकार किया । उन्होंने अपने समस्त आभूषणों को बेंचकर साधुओं का एक वृहत भंडारा किया । व्यासजी को अपनी पत्नी के इस आदर्श कार्य से बड़ी प्रसन्नता हुई ।
उन्हें साधुओं की सेवा करने में बड़ी रुचि थी । एक बार संतों की एक मंडली व्यासजी की अतिथि हुई । जब सब प्रकार से आग्रह करने पर भी वह मंडली एक दिन और रुकने के लिए राजी नहीं हुई तो व्यास जी ने, उनके ठाकुर जी उठा लिये और उनके स्थान पर चुपचाप एक पक्षी बन्द कर दिया । साधु जब चलने लगे तो व्यासजी ने उनसे कहा कि आप लोग हमारी अनुमति के बिना जा रहे हैं । देखिये आपके ठाकुर जी आपको पुनः यहाँ लौटा लायेगे । इस कथन पर बिना ध्यान दिये साधुमंडली वहां से चली । तीन मील चल कर सरिता में साधुओं ने स्नान करने के उपरांत ज्यों ही अपने ठाकुरजी की सेवा करने के लिये संपुट खोला तो उसमें से एक पक्षी निकल कर वृन्दावन की ओर को उड़ गया । साधुओं को व्यास जी की वह याद आई जो उन्होंने चलते समय कही थी । वे पुनः वापस आये । व्यास जी प्रसन्न हुये । उनके ठाकुर देकर उन्होंने उस मंडली का पूर्ववत् आदर सत्कार करना प्रारम्भ किया । जब भक्तों के प्रति व्यासजी की आदर भावना और निष्ठा की चर्चा चारों ओर प्राप्त हुई तो उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से एक महन्त उनके पास आये और अपने को बहुत भूखा बताते हुए भोजन मांगने लगे । उस समय व्यास जी के आराध्य देव युगल किशोरजी को भोग नहीं लगा था । अतः व्यासजी ने उन महन्तजी को थोड़ा देर ठहरने के लिए कहा इस पर महन्त जी इन्हें गालियां देने लगे । व्यासजी ने विनम्र भाव से यह दोहा पढ़ा -
’व्यास’ बड़ाई और की, मेरे मन धिक्कार ।
संतन की गारी भली, यह मेरी श्रृंगार ।।
इसे सुनकर महन्त जी को चुप हो जाना पड़ा । थोड़ी ही देर में ठाकुरजी को भोग लग जाने पर एक पत्तल परोस कर व्यासजी उन महन्त जी के लिए ले आये । उसमें से थोड़ा सा ही खा कर महन्त जी ने पेट के दर्द का बहाना करते हुए वह प्रसाद जूठा कर वहीं छोड़ दिया । व्यासजी ने उस उच्छिष्ट प्रसाद को मस्तक से लगाया और खाने लगे । सन्त-सेवा और प्रसाद के प्रति इतनी श्रद्धा देखकर परीक्षक महन्त गद्गद हो गये और उनके नेत्रों में आंसू भर आये ।
व्यासजी पूर्ण समर्पण भाव से राधा कृष्ण की भक्ति करते थे । इनके सम्बन्ध में लोक में अनेक किंवदंतियों लोकमुख में जीवित हैं । जिनका उल्लेख वासुदेव गोस्वामी जी ने अपनी पुस्तक हरिराम व्यास में किया है जिनमें व्यासजी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना है उनके जनेऊ तोड़कर नूपुर बांधने की । लगभग सभी भक्त चरित्रों में जहां व्यासजी का उल्लेख किया गया है, इस घटना का वर्णन हुआ है । एक समय रास में नृत्य करती हुई राधिका जी के चरण के नूपुर की डोरी टूट गई । रास लीला में विक्षेप पड़ने लगा । उपस्थित रसिक जन एक दूसरे का मंँुह ताकने लगे । परन्तु उपाय सूझा तो व्यासजी को । उन्होंने चट से अपना यज्ञोपवीत तोड़कर नूपुर बांँध दिया । यह देखकर उपस्थित लोगों ने व्यासजी से ताना देते हुए कहा कि ब्राह्मण होकर तुमने जनेऊ ही तोड़ा डाला? व्यासजी ने उन्हें यह उत्तर दिया कि मेरे यज्ञोपवीत का लक्ष्य ही श्री राधिका के चरणों की प्राप्ति करना ही तो था ।
वृन्दावन में व्यासजी ने श्री युगुलकिशोर जी का एक सुन्दर और विशाल मन्दिर निर्माण कराया था । इस मन्दिर का भग्नावशेष अब भी व्यास घेरे में वर्तमान हैं । श्री व्यास जी द्वारा पूजित श्री युगुलकिशोर जी आज कल पन्ना में विराजमान हैं, जहाँ उनका मन्दिर सम्वत 1833 वि. के पूर्व महाराजा हिन्दूपति के समय में बना था । श्री युगलकिशोरजी की सेवा के प्रसंग में भी व्यासजी से सम्बन्धित चमत्कारपूर्ण दो घटनाएँ मुख्यरूप से प्रचलित हैं, जिनका भक्त साहित्य में सदा से उल्लेख होता आया है । महाराजा मधुकरशाह ने स्वर्ण की एक वंशी श्री ठाकुरजी के धारण करने  के लिये भेंट की । वह कुछ मोटी थी । इससे धारण करते समय उससे श्री विग्रह की उँगली कुछ ्िरछल गई और रक्त निकल आया । यह देख व्यासजी ने जल्दी से वंशी खींचकर फेंकी और उँगली में पनकपड़ा(पानी में भिंगोकर वस्त्र) लपेट दिया । व्यासजी के दुःख की सीमा न थी । उन्होंने भोजन भी त्याग दिया । पश्चाताप में ही सारा दिन बीता; किन्तु जब सायंकाल उन्होंने पट खोले, तो श्री युगलकिशोर जी को वंशीधारण किये हुए पाया । व्यास जी प्रसन्न हो गये । तब से ठाकुरजी की सेवा में उनकी उस अँगुली से गीली पट्टी बाँधने की प्रथा आज तक यथावत् चली आ रही है ।
इस प्रकार की दूसरी घटना कही जाती है कि किसी ने श्री ठाकुर जी की सेवा के लिए एक जरकसी पगड़ी चढ़ाई । व्यासजी ने उस पगड़ी को धारण करने का असफल प्रयत्न किया, क्योंकि उसके बांधने मंे वह पगड़ी ठाकुरजी के मस्तक से बार-बार खिसक पड़ती है । अन्त में परेशान होकर व्यासजी ने यह कहकर उसे वहीं छोड़ दी कि मेरी बंधी पसन्द नहीं आती, तो स्वयं बाध लो । थोड़ी देर के उपरान्त जब वे मन्दिर के भीतर गये तब उन्होंने अपने इष्टदेव को पगड़ी बांधे हुए पाया ।
इसी तरह हरिराम व्यास जी के संबंध में ओरछा के आसपास यह दंतकथा और प्रचलित है कि शरद-ऋतु की ज्योत्सना से युक्त एक रात वेतबा नदी के किनारे अपने आराध्य श्री ठाकुरजी की मूर्ति के समक्ष अपने प्रिय शिष्य महाराज मधुकर शाह के साथ रास रचाई । इस रास में प्रेमभाव से बेसुध होकर व्यास जी नृत्य करते रहे और उनके साथ महाराज मधुकर शाह ने भी नूपुर बंाधकर नृत्य किया । यह प्रेमभाव से युक्त नृत्य देखकर देवगण प्रसन्न हो गये थे और आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी थी । कहा जाता है कि आकाश से धरती पर गिरा प्रत्येक पुष्प सोने का हो गया था । इसीलिये इस बेतबा घाट का नाम ‘कंचनाघाट‘ पडा है ।
व्यासजी राधाकृष्ण के अनन्य भक्त थे । कहते हैं कि उन्होंने राधाकृष्ण के अतिरिक्त किसी की पूजा नहीं की । यहां तक कि अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर भी गणेश पूजन करने से इंकार कर दिया था । जिसके कारण परिजनों व समाज का विरोध उन्हें झेलना पड़ा था । व्यास जी ने अपने जीवन में एकनिष्ठ भक्तिभाव के मर्म को पहचान कर उपासना की विविध जड़ीभूत सच्चाइयों को अस्वीकार कर प्रेम के मूल्यों को नये ढ़ंग से परिभाषित किया ।
- एम.आई.जी. -7, न्यू हाउसिंग बोर्ड कालोनी 
छतरपुर (म.प्र.)

हिन्दी में दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र

हिन्दी में दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र 
- डॉ. बहादुर सिंह परमार
भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था सैकड़ों वर्षों से कायम है । इससे जड़ता आई, विसंगतियाँ पैदा हुई और समाज के एक बहुत बड़े तबके को जाति के आधार पर शोषित बना लिया गया जबकि सच्चे अर्थों में यही वर्ग उत्पादक रहा है । समय बदला, शिक्षा के कारण नई चेतना आई लोगों में अपने हकों के प्रति जाग्रति आई और वे उन्हें पाने के लिए जद्दोजेहद करने लगे । वर्ण -व्यवस्था में जिन्हें ’शूद्र’ की संज्ञा दी गइ्र वे गाँधीयुग में ’हरिजन’ बने और अब नया शब्द ’दलित’ आया । दलित वर्ग के दुख दर्दो। को अभिव्यक्ति देने हेतु साहित्य में रचनाएंे आई जिन्हें ’दलित साहित्य’ की श्रेणी में रखा जाने लगा । दलित साहित्य की चर्चा विगत कुछ वर्षों में हिन्दी जगत में जोर शेर से हो रही है । इसके पहले मराठी में दलित साहित्य अपनी पहचान कायम कर अपने को स्थापित कर चुका है । यहां एक प्रश्न उठता है कि हिन्दी की तुलना में मराठी में दलित लेखन पहले क्यों आया ? इस सवाल का जबाब जब हम तलाशते हैं तो पाते हैं कि महाराष्ट्र की सामाजिक परिस्थितियाँ हिन्दी भाषी क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियों से भिन्न रहीं हैं । महाराष्ट्र में छुआछूत बहुत जबर्दस्त रूप से कायम रही तथा सवर्णों में श्रेष्टता का भाव कूट कूट कर भरा रहा जिसे वह प्रदर्शित भी करते रहे किन्तु भाषी क्षेत्र के अंचलों में उच्च वर्णीय लोगों ने दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति रखी है । उदाहरण के लिए बुन्देलखण्ड अंचल के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में अछूत जातियों (दलित वर्ग )के प्रति छुआछूत का भाव तो होता है किन्तु उन्हें ’ सबोधन के स्तर पर चाचा, चाची, भाई, बहिन आदि से संबोधित किया जाता है । दूसरा इनके रिश्तेदारों को भी गांव का मेहमान माना जाता है । इसमें हो सकता है कि यह छद्म सहानुभूति भी शोषण को कायम रखने के लिए हो। इसी के साथ दूसरा कारण हिन्दी क्षेत्र में शिक्षा का प्रसाद देर से होना तथा मराठी क्षेत्र में बाबा भीमराव अम्बेडकर का प्रादुर्भाव होना भी है । बाबा भीमराव ने मराठी क्षेत्र में दलित वर्ग मेें जो चेतना जगाई, वह अतुलनीय व वंदनीय है । हिन्दी भाषाी क्षेत्र में अशिक्षा के कारण भाग्यवादिता व समझौता परस्ती ज्यादा पाई जाती है जिससे वह मराठी की तुलना में दलित चेतना में पिछड़ गया । खैर हिन्दी क्षेत्र में दलित चेतना के स्वर नौवें दशक में सुनाई देते हैं जब 1980 में दया पॅवार को साहित्य अकादमी पुरस्कार आत्मकथा ’बलूत’ प्राप्त होता है । इसका हिन्दी में अनुवाद ’अछूत’ के नाम से छपता है । जिसके बाद 1981 में ग्वालियर में इस विषय पर केन्द्रित गोष्ठी का आयोजन होता है । तदन्तर दलित साहित्य पर चर्चा तो चलती रहती किन्तु 1992 के बाद इसका विस्तार तेजी से होता है अगस्त 1992 में ’हंस’ के तत्वावधान में दिल्ली में दलित साहित्य पर केन्द्रित गोष्ठी में मूल स्वर दलित साहित्य के प्रति आश्वस्ति का नहीं लेकिन उसमें एक बात स्पष्ट थी कि हिन्दी में दलित साहित्य का प्रवेश शुरू वहो गया है । जून 1993 में शिवपुरी में ’दलित कलम’ के नाम से दलित साहित्य पर केन्द्रित एक वृहद आयोजन मप्र प्रलेसं द्वारा होता है जिसमें मराठी के चोटी के दलित लेखक भागदीारी करते हैं । इस आयोजन में हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा था कि “शिवपुरी में यह दलित कलम रोपी जा रही है । हिन्दी के लिए शीघ्र ही महावृक्ष हो जायेगी ।1 और वास्तव में इस कलम से अच्छा वृक्ष विकसित हुआ । आज हिन्दी क्षेत्र में दलित साहित्य के लेखकों की अच्छी जमात हो गई है ।
हिन्दी क्षेत्र में यह काफी समय तक बहस होती रही कि दलित साहित्य किसे माना जाए । इसमें एक वर्ग वह था जो जोर देता था कि दलित के द्वारा लिखा गया है । साहित्य दलित साहित्य हो सकता है तथा दूसरा वर्ग मानता था कि नहीं गैर दलित द्वारा दलितों के हित में लिखा गया साहित्य भी दलित साहित्य हो सकता है । लम्बी बहसों के उपरान्त अब यह माना जाने लगा है कि दलित ही दलित की पीड़ा को भोगा हुआ आयातित अनुभूति से सहानुभूति भरा साहित्य ही लख सकता है । इसको परिभाषित करने हेतु कई विचारकों ने मत व्यक्त किए । डा. शरण कुमार लिम्बाले दलित के बारे में कहते है। कि ’’दलित केवल-हरिजन और नव बौद्ध नहीं । गांव की सीमा के बाहर रहने वाली सभी अछूत जातियाँ, आदिवासी, भूमिहीन खेत मजदूर, श्रमिक, कष्टकारी जनता और यायावर जातियां सभी की सभी ’दलित’ शब्द से व्याख्याथित होती है ।”2 इसी पर विचार करते हुए बाबूराव बागुल कहते हैं कि ’’दलित साहित्य वह लेखन है, जो वर्ण-व्यवस्था के विरोध में और उसके विपरीत मूल्यों के लिए संघर्षरत मनुष्य से प्रतिबद्ध है ।  वर्ण व्यवस्था अर्थात् द्वेष, शत्रुता, मत्सर, तिरस्कार की युद्ध भावना । इसके विपरीत मूल्य अर्थात प्रेम, बंधुत्व, समता, भ्रातृभावपूर्ण शांन्ति और समृद्धि । दलित शब्द से अनेक प्रकार का बोध होता है, जैसे -दुख बोध, अपमान-बोध, दैन्य-दासत्व बोध जाति-वर्ग बोध, विश्व बंधुत्व बोध, और क्रांति-बोध।”3 इस तरह कहा जा सकता है कि दलितों के  दुख दर्दों, परेशानियों, गुलामी, अधोगति तथा उपहास के साथ ही दरिद्रता का चित्रण करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है । दलित साहित्य, समाज में अन्याय, शोषण, अत्याचार आदि से पिसते दलित वर्ग में एक नयी चेतना भरता है, उन्हंे उनके अधिकारों के प्रति संघर्ष   करने की प्रेरणा देता है । दलित साहित्य दलितों को यह याद कराने का प्रयास करता है कि उसने जो संघर्ष किया है, कर रहा है वह अपने पूरे वर्ग को शोषण, अत्याचार एवं अन्याय से मुक्ति का संघर्ष हैं ।4 दलित साहित्य को परिभाषित करते हुए  श्री एस.एल. विरदी कहते हैं कि “दलित साहित्य कला के लिए कला के विरुद्ध, सनातन रूढ़ियों के विरुद्ध तथा परम्परा व जातिवाद के विरुद्ध है ।”  जबकि ओमप्रकाश बाल्मीकि इसे समाज में फैले आर्थिक शोषण के विरुद्ध एवं सशक्त क्रांति मानते हैं । डॉ. धर्मवीर इसे “दलितों द्वारा, दलितों के लिए, दलितों का साहित्य ’’ स्वीकार करते हैं । इस तरह देखा जाए तो दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत हैं किन्तु सभी के केन्द्र में वर्ण वाद व जातिवाद का विरोध, परम्परागत रूढ़ियों-आडम्बरों का प्रतिकार तथा मानव मूल्यों पर आधारित व्यवस्था को स्थापित करने का मूल भाव है ।
हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में दलित लेखन पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट रूप से कबीर, रैदास के पहले नाथों व सिद्धों के साहित्य में वर्ण, जाति व्यवस्था पर प्रहार करने वाला साहित्य मिलता है किन्तु जिस शिद्दत के साथ कबीर ने समाज में व्याप्त पाखण्डों को उखाड़ा, वह बेमिसाल है । रैदास ने भी अपने ढंग से दलितों की पीड़ा को मुखरित किया है । नवजागरण काल में हिन्दी क्षेत्र में कई लेखक हुए हैं जिन्होंने दलितों के दुख दर्द को लिखा । उनमें राधा मोहन गोकुल जी का नाम महत्वपूर्ण है । उनका उस समय यह लिखना कि “गोस्वामी तुलसीदास अच्छे कवि होते हुए भी रामायण में जिस अंध विश्वास और पुरोहित कैतब को दृढ़ करना चाहते हैं, उसके लिए हम उनका साथ नहीं दे सकते । हमकों तो जरूर उनके विरुद्ध बगावत का ही झंडा उठाना चाहिए ।‘‘5  इनके अतिरिक्त रामनारायण यादवेन्दु आदि अनेक रचनाकार दलित चेतना से अपूरित रचनाएॅं लिख समाज का दिशा दर्शन करते रहे । इसके बाद विगत दो दशकों से हिन्दी क्षेत्र में दलित लेखकों का एक पूरा दस्ता से तैयार हो गया है । जिनमें बिहारीलाल हरित, मोहनदास नैमिशराय, कंवल भारती, डॉ.सोहन पाल सुमनाक्षर, डॉ. सुखबीर सिंह, डॉ.धर्मवीर, ओमप्रकाश बाल्मीकि, डॉ.एम.सिंह, डॉ.कुसुमलता मेघवाल, एन.आर.सागर, डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, लालचन्द्र राही, जयप्रकाश कर्दम, डॉ. दयानन्द बटोही, डॉ.श्यौराज सिंह ’बेचैन’, लक्ष्मी नारायण सुधाकर, डॉ. कुसुम वियोगी, विपिन बिहारी, सूरजपाल चौहान, हरिकिशन संतोषी व सुशीला टाकभौरे आदि के नाम आते हैं । उक्त सभी रचनाकार अपने नये तेवरों के साथ सतत् सर्जनत हैं ।
दलित साहित्य के सौन्दर्य शास्त्र पर जब हम चिन्तन करते हैं तो पाते हैं, यह साहित्य वेदना व नकार से जन्मा है । दलितों को हजारों वर्षों तक वर्णव्यवस्था के नाम पर दबाया जाता रहा है । उन्हे अशिक्षित रखा गया है । इसलिए दलित साहित्य में मुखरित अनुभव अभी तक किसी अन्य साहित्य में अभिव्यक्त नहीं हुए है। अतः दलितों ने जो भोगा उसे ही लिखा है । इस लेखन में अभाव, भेदभाव, पीड़ा, आक्रोश, तथा विरोध के स्वर स्पष्ट दिखाई देते हैं । इस साहित्य की समीक्षा भारतीय शास्त्रीय परम्परा के निकषों पर करना पूरी तरह बेईमानी होगा । दलितों की पीड़ा को वाणी देने वाले साहित्य को सौन्दर्यशास्त्र की नई दृष्टि से देखना होगा । सौन्दर्यशास्त्र की परिधि में मुख्यतः चार प्रमुख कला तत्वों का योगदान है - सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब तथा प्रतीक । दलित साहित्य की आलोचना नवीन सौन्दर्य दृष्टि से ही की जा सकती है । सौन्दर्य क्या है ? इस पर मार्टिन, बैलेण्टाइन तथा मिल्टन एच.वर्ड ने उल्लेखनीय विचार व्यक्त किए हैं । उनके विचारों के आधार पर कहा जा  सकता है कि सौन्दर्य का अपने आपमें कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता है । सौन्दर्य का सत्य, शिव और नैतिकता से कोई अनिवार्य अथवा ऋजु सम्बन्ध नहीं रहता है । यह भी जरूरी नहीं है कि सुन्दर सर्वदा सत्य हो, प्राकृतिक हो अथवा प्रकृति का अनुकरण हों । कोई भी रूप सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा निश्चितरूपेण ’सुन्दरतम’ नहीं कहा जा सकता, कारण यह आवश्यक नहीं है कि कोई एक वस्तु सबको सुन्दर प्रतीत हो । सन्तुलन सौन्दर्य का महत्वपूर्ण तत्व है किन्तु सौन्दर्य की सृष्टि सन्तुलन के बिना भी सम्भव है । संगति (हार्मनी) सौन्दर्य के लिए वांछनीय है, आवश्यक है किन्तु कौन सी वस्तु संगतिपूर्ण है यह निर्णय व्यक्तिगत रुचि की बात है।7 सुन्दर असुन्दर का निर्णय अथवा सौन्दर्य भावना व्यक्ति की अलग अलग हो सकती है । अतः जो दलितांे के लिए सुन्दर  है वह गैर दलितों का असुन्दर है क्योंकि दलित शोषित है और गैर दलित शोषक । इस दृष्टिकोंण से हम जब दलित साहित्य को विवेचित करें तो हमें दलित साहित्य में मनुष्यता की स्थापना को सौन्दर्य मानना होगा । जब दलित लेखक भेदभाव की नीति को उघाड़ता है तो समाज का वह तबका जो इस भेदभाव का पोषक रहा है, इसे साहित्य न मानने के कुचक्र को रचने हेतु शास्त्रीय तर्कों पर सत्यं, शिवं, सुन्दरं की व्याख्या लेकर बैठ जाते हैं । इस मामले में डॉ.शरण कुमार लिम्बाले से सहमत हुआ जा सकता है कि “सत्यं शिवं और सुन्दरं भेदभाव की कल्पनाएं हैं- जिसके आधार पर आम आदमी का शोषण हुआ है । दरअसल सत्यं, शिवं और सुन्दरम की धारणा तो सवर्ण समाज के स्वार्थ-साधना के लिए रची गई साजिश है । ..... विश्व में मनुष्य जैसी ’सत्य और सुन्दर’ दूसरी कोई चीज नहीं है । इसीलिए तो मनुष्य की समता, स्वतंत्रता, न्याय और बन्धुत्व की चर्चा होनी आवश्यक है ।8 इसी सौन्दर्य दृष्टि पर दलित साहित्य को परखा जाना चाहिए ।
जिस प्रकार कल्पना का धनी किन्तु बुद्धि का दरिद्र कलाकार प्रथम पंक्ति का अधिकारी नहीं हो सकता, उसी तरह बुद्धि का समृद्ध किन्तु कल्पना का अकिंचन भी प्रथम कोटि में गण्य नहीं बन सकता । इसीलिए जिस युग में कल्पना और बुद्धि का समन्वय रहता है, उसी में महान् कलाकार पैदा करने की क्षमता रहती है । कल्पना में अदृश्य को दृश्य बनाने की एक अद्भुत शक्ति रहती है । कला में कल्पना के विनियोग से अप्रस्तुतों तथा नूतन वस्तु व्यापार विधानों का निर्माण होता है । जॉन सी. इक्लेस की मान्यता है कि रचनात्मक कल्पना मानसिक अनुभूतियों की वह सर्वोपरि सतह है, जो ऐन्द्रिय अनुभूति, मानसिक बिम्ब, स्मृति और मनोविभ्रम की अनेक निम्नवर्त्तिनी सतहों पर निर्भर रहती है । अतः मस्तिष्क की  क्रिया से सम्बद्ध होने के कारण कल्पना का अनिवार्य सम्बन्ध प्रमस्तिष्क बाह्यक (सेरेब्रल कोर्टेक्स) के साथ रहता है।9 जिससे रचनाकार की कल्पना उसके अनुभवों से गंुफित ही बेहतर भविष्य की कल्पनाएं साहित्य में आती है । दलित साहित्य में जब हम कल्पना सम्बन्धी विचार करते हैं तो देखते है कि अधिकांश रचनाओं में वर्तमान भेदभाव पूर्ण सामाजिक व्यवहार को खत्म करके समतामूलक समाज की कल्पना केन्द्र में है । दलित साहित्य में बाबा अम्बेडकर से प्रेरणा लेकर जीवन संघर्ष करके उज्ज्वल भविष्य  की कल्पनाएं हैं । इस साहित्य में वर्तमान व्यवस्था के प्रति नकार तथा गुलामी के विरुद्ध चेतना है । दलित साहित्य में स्वतंत्रता के सभी रूपों और अंतरंगनांे का दर्शन होता है । इसमें स्वतंत्रता की कल्पना अथवा विचार के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक पहलू के समान ही सौन्दर्य शास्त्रीय पहलू भी हैं । स्वातंत्र्य की भावना दलित साहित्य का प्राणतत्व है । समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व तीनों जीवन मूल्य दलित साहित्य के सौन्दर्य तत्व हैं ।10 इस साहित्य के लेखकों के अनुभवों का ब्यौरा, उनके द्वारा पारम्परिक मूल्यों के विरुद्ध किये गये आक्रोश, निषेध और विद्रोह तथा सामाजिक संदर्भों का ज्ञान हुए बिना दलित साहित्य की कल्पनाओं को सही ढंग से नहीं समझा जा सकता है ।
साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र में प्रतीकों का अपना अलग महत्व है, इनका विश्लेषण करते समय हमें सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि रखना चाहिए क्योंकि साहित्यिक प्रतीकों का निर्माण सामान्य जन के द्वारा नहीं साहित्यकार के द्वारा होता है । रचनाकार स्वानुभूति के जिन अंशों को सामान्य अभिव्यक्ति के प्रचलित सांचों में ढाल नहीं पाता है, उन अंशों की व्यंजना के लिए ही वह प्रतीकों को सहारा लेता है । इस तरह रचनाकार स्वानुभूति के अकथनीय अंशों को प्रतीक के द्वारा कथनीय और प्रेषणीय बनाता है । दलित लेखकों के प्रतीक परम्परागत प्रतीकों से भिन्न हैं और हों भी क्यों नहीं ? इस बारे डॉ. शरण कुमार लिम्बाले का यह कहना कि “संस्कृत को देववाणी मानकर, शूद्रों को संस्कृत पढ़ने से प्रतिबंधित किया गया । इसलिए बाबा साहब अम्बेडकर संस्कृत भाषा नहीं पढ़ सके, उन्हें संस्कृत की बजाय फारसी भाषा पढ़नी पड़ी । शंबूर का वध करने वाला, राम हमारा आदर्श नहीं हो सकता । जिस गीता में चातुर्वर्ण्य का समर्थन है ऐसा महाभारत हमें वंदनीय नहीं लगता है ।11 दलित लेखकों के आदर्श प्रतीकोें में एकलव्य, शम्बूक, बुद्ध, रैदास, बाबा भीमराव अम्बेडकर आदि है । आज इनके अतिरिक्त नए प्रतीकों को रच रहे हेै ।
दलित साहित्य के सौन्दर्य शास्त्र को लेकर हिन्दी जगत में अब काफी चर्चा हो रही है । रमणिका गुप्ता के द्वारा अनुवादित डॉ. शरण कुमार लिम्बाले की पुस्तक “दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र”  वाणी प्रकाशन नई दिल्ली ने प्रकाशित की है । इसके बाद ओम प्रकाश बाल्मीकि की पुस्तक भी “दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र” आई है जिसके द्वारा दलित साहित्य को समझने व परखने हेतु मार्ग प्रशस्त हुआ है । आज दलित साहित्य को समझने के लिए मार्क्सवाद का भी सहारा लिया जा रहा है । दलित साहित्य तथा अश्वेत साहित्य में समानताएं तथा असमानताएं ढूंँढ़ी जा रहीं है । दलित चेतना से आपूरित अब केवल आत्म कथाएं नहीं कविताएं, कहानियों, उपन्यास तथा नाटक आदि लिखे जा रहे हैं । शोध के क्षेत्र में दलित लेखन व चेतना सूत्र तलाशे जा रहे हैं । लोकांचलों में गुम दलित स्वरों को रेखांकित किया जा रहा है । इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी क्षेत्र में दलित चेतना आ गई हैं । समाज के एक बहुत बड़े तबके को जो वर्षों से कटा था, साहित्य में स्वर मिल गया है  । हमें कवि सुरेश तनवर की इन पंक्तियों में भविष्य दिखाई देता है कि-
मैं-
विद्रोह करूंँगा
उन सारे शब्दों के खिलाफ
जिनसे गढ़ गए तुम्हारे धर्मशास्त्र और
झूठ भरे इतिहास ।
मैं विद्रोह करूँगा
चुप नहीं रहूँगा ।12

सहायक प्राध्यापक (हिन्दी विभाग)
शास.महाराजा स्नातकोत्तर स्वशासी
महाविद्यालय छतरुपर म.प्र. 471001




संदर्भ संकेत-
1. वसुधा - 58, जुलाई -सितम्बर 2003, पृष्ठ 14 2. डॉ. शरण कुमार लिम्बाले, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, पृ.38
3. बाबूराव बागुल, वसुधा-58, जुलाई-सितम्बर 2003 पृ. 25, 4. गजेन्द्र नामदेव ’कुमार’ दलित साहित्य रचना और विचार पृ.65
5. राधामोहन गोकुल जी का दलित विमर्श लेख से - वसुधा 55 पृ.76, 6. जयप्रकाश कर्दम, उत्तरभारत में दलित साहित्य, दलित सा. रचना और विचार पृ.80, 7. डॉ. कुमार विमल, सौन्दर्य शास्त्र के तत्व, पृ.109, 8. जॉन सी इक्लेस, साइंस्टीफिक, अमेरिका, सितम्बर 1958 पृ.141, 10. डॉ. शरण कुमार लिम्बाले दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पृ.116, 11 डॉ. शरण कुमार लिम्बाले  दलित
पृ.42, 12.सुरेश तनवर, चुप नहीं रहूंगा, वसुधा -58 पृष्ठ 38



बुन्देली काव्य में वृक्ष

बुन्देली काव्य में वृक्ष
- डॉ. बहादुर सिंह परमार 
मानव का प्रकृति के साथ गहरा सम्बन्ध रहा है । प्रकृति के साथ समन्वय से ही मानव कल्याण होता रहा है । जैसे ही मानव ने प्रकृति के साथ अत्याचार करना प्रारम्भ किया वैसे ही प्रकृति ने भी मानव को दुखद परिस्थितियों में डालना शुरू कर दिया । प्रकृति के तत्वों में वृक्ष, प्राणी, धरा, पर्वत तथा सागर आदि सभी आते है ।  वृक्षें का मानव जीवन मंे विशिष्ट महत्व है । वे प्राणवायु तो देते ही हैं साथ में फलों से मानव को खाद्य पदार्थ, औषधियाँ तथा अन्य सुविधायें प्रदत्त करते है । बुन्देलखण्ड क्षेत्र आरंभिक अवस्था से ही वन आच्छादित प्रांत रहा है । वृक्षों के साथ लोक जीवन का गहरा तदात्म्य रहा है । इसी कारण यहां के लोक कवि भी वृक्षों  की उपादेयता को अपनी काव्य-सर्जना में अनदेखा नहीं कर सके बल्कि कहा जाये तो वृक्षों के संरक्षण व संवर्धन हेतु लोक मानस को जागृत करने का कार्य भी इन बुन्देली कवियों ने किया है । ईसुरी से लेकर आधुनिक पीढ़ी तक के कवि अपनी रचनाओं में प्रकृति व वृक्षों के महत्व को रेखांकित करते हैं ।
लोक कवि जनजीवन का सजग चितेरा होता है और फिर ईसुरी तो लोक चेतना के महत्वपूर्ण कवि हैं । उन्होंने जहांँ एक ओर लोकजीवन में व्याप्त श्रृंगार, प्रेम और करूणा के चित्रों को अपनी फागों में उकेरा वहीं दूसरी ओर लोक जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं को उठाया । तत्कालीन समाज में भी वृक्षों पर लोग कुल्हाड़ियों से प्रहार करने लगते है जिससे मानव के जीवन आधार वृक्षों की अंधाधुंध कटाई प्रारम्भ हो जाती है । लोक कवि लोक चेतना का दीपक भी होता है । ईसुरी का हृदय वृक्षों को काटता देख आक्रोश से भर उठता है और वे महुआ के पेड़ों को काटने वालों को फटकारते हुए यह चौकड़ियाँ लिखते है:-
इनपै लगे कुलरियाँ घालन, मउआ मानस पालन ।
इनें काटबो नईं चइयत ते, काट देत जे कालन ।
ऐसे रूख भूँख के लाने, लगवा दये नंद लालन ।
जो कर देत नई सी ’ईसुरी’  मरी मराई खालन ।1
अर्थात् ये महुआ के वृक्ष मनुष्य के जीवन को पालने वाले हैं जिन पर तुम कुल्हाड़ियों के प्रहार कर रहे हो । इनको काटना नहीं चाहिए था क्योंकि ये विपत्तिकाल को काटने में सहायक हैं । ऐसे वृक्षों को नन्दलाल ने भूख मिटाने हेतु लगवा दिया था जिनके फल व फूल खाकर मरे से लोग हष्ट पुष्ट हो जाते हैं । ईसुरी जहां एक ओर महुआ के वृक्षों के काटने वालों को फटकारते हैं वहीं नीम के पेड़ की छाया का महत्व एक अन्य फाग में समझाते हुए कहते है:-
सीतल एइ नीम की छइयाँ, घामों व्यापत नइयाँ ।
धरती नौं जे छू छू जावें, हैं लालौइँ डरइयाँ ।
फिर करबू आराम लौट कें, अपने जियरा खइयाँ ।
एसोइ हरौ बनो रय ’ईसुर, हमरे जियत गुसइयाँ ।2
अर्थात् इस नीम के वृक्ष की छाया अत्यधिक शीतल है जिससे धूप यहांँ नहीं व्यापती ।  इसकी हरी-भरी शाखाएंँ हवा के बहाव से करती का स्पर्श करती हैं । अपने मन की शांति हेतु लौट कर यहीं विश्राम करेंगे । हे ! भगवान् यह वृक्ष हमारे जीवन में ऐसा ही हरा -भरा बना रहे । ईसुरी की भांति आज के बुन्देली कवि भी वृक्षांे और वनो के महत्व को समझते हुए आम जनता को अपनी रचनाओं द्वारा समझाते हैं । श्री लल्लूमल चौरसिया अपने बुन्देलखण्ड अँंचल की वन सम्पदा के बारे में बताते हुए लिखते है:-
नौनो अपनो देश गुड़ानों, वन में भरो खजानो ।
हर्र बहेरौ और आँवरो, मूर सजीवन जानो ।
पीपर नीम प्राण वायु के, प्रथम देवता मानो ।
दूध बरा को संग बतासा, धात रोग में छानों ।3
अर्थात् अपने प्रिय बुन्देलखण्ड प्रान्त में वन सम्पदा का कोष भरा पड़ा है । इसमें हर्र, बहेरा और आँवला के वृक्षों से उनके फल प्राप्त होते हैं , जो संजीवनी बूटी के समान है । पीपल व नीम के वृक्ष प्राण वायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, इसीलिए इन्हें देवता माना जाता है । धात रोग को समाप्त करने हेतु बट वृक्ष का दूध बतासा के साथ खाना चाहिए । इस तरह कवि वन सम्पदा के उपयोग को पाठकों के समक्ष रखता है । महुआ के वृक्षों से प्राप्त फूल व फल से बुन्देलखण्ड का गरीब आदमी अपना भरण पोषण करता था किन्तु लोक कवि ईसुरी की सीख को अनदेखा कर महुआ के पेड़ों को काट दिया गया जिससे बुन्देलखण्ड में विकट स्थिति उत्पन्न हो गई है । इस पर लोक कवि श्री लल्लूमल चौरसिया की एक चौकड़िया देखिये -
महुआ खाकें पेट भरत ते, अपनी गुजर करत ते ।
कैसउ परै अकाल कबहुँ कोउ, भूँखन नई मरत ते ।
मुरका लटा और डुबरी के, लाले नई परत ते ।
उनकी खुद मिटा दई जिनसें, दीन अधीन पलत ते ।4
अर्थात् बुन्देलखण्ड के ग्रामवासी महुआ खाकर अपना पेट भरकर गुजर-बसर करते थे । कितना ही भयंकर अकाल क्यों न पड़े, कोई भूखों नहीं मरता था ं मुरका, लटा और डुबरी (जो महुआ से बनते हैं ) के लाले नहीं पड़ते थे किन्तु दीनों-हीनों को पालने वाले ऐसे महुआ के वृक्षों को काटकर खत्म कर दिया जिससे दुखद स्थिति बन गई है ।
श्री जगदीश रावत ’जगदीश्वर’ अपनी बुन्देली रचनाओं में वृक्षों के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि पर्यावरण संतुलन हेतु वृक्ष बहुत महत्वपूर्ण है । वे लिखते हैं -
नौने पर्यावरन के लाने, पेड़े हमें लगानें,
नास मिटा दई रूख डाँग की, अब नईं और नसानें ।
ऐसी टीका टीक दुपरिया, बिरछन में बिलमाने ।
चेतौ भैया ’जगीदश्वर’ जो, अपने प्रान बचाने ।5
पर्यावरण संतुलन हेतु पेड़ों की न केवल रक्षा करना है, बल्कि और पेड़ लगाने की जरूरत है । जंगलों को काटकर अब और नष्ट नहीं होने देना है । भीषण गर्मी की तपती दुपहरी में वृक्षों की छाया ही शीतलता प्रदान करती है । इसलिए वृक्षों को काटने से रोकते हुए श्री जगदीश्वर कहते हैं:-
हरे -भरे बिरछा न काटो रे भैया लगहैगों अभिशाप, मोरे लाल ।
प्रान- पियारे हैं पेड़ हमारे जीवन दो चुपचाप, मोरे लाल ।
पेड़ लगाओ, लो पुण्य कमाओं, अच्छौ लगै अपने आप, मोरे लाल ।
रूख बनाओं न ठंूठ रमैंया, कुदरत  बन जै साँप, मोरे लाल । पंछी पखेरन कौ रैन -रैन बसैरा, बिरछा तो हैं, माई बाप, मोरे लाल ।
’जगदीश्वर- जब जंगल कटहैं धरती जैहैं काँप, मोरे लाल ।6
अतः हरे भरे वृक्षों को न काटने की सलाह देते हुए कवि कहता है कि वृक्षों के काटने से अभिशाप लगेगा । प्राणों से प्रिय इन वृक्षों को चुपचाप अपनी गति से बढ़ने दिया जाये । इसके साथ हमें अब और वृक्ष लगाने की आवश्यकता है क्योंकि वृक्षों के बिना प्रकृति हम सबके लिए काल बन जायेगी । एक वृक्ष लगाना दस पुत्र पालने जितना पुण्य देते है, अतः धरती न डोले इसके लिए जंगलों की कटाई रोकिये । वृक्षों की अन्धाधुंध कटाई से कहीं पर सूखा पड़ता है, तो कहीं पर बाढ़ आती है । इसी पर्यावरण असंतुलन से भूकम्प जैसे प्राकृतिक आपदायें मानव जीवन को त्रस्त करती हैं । वृक्षों की कमी से वायु शुद्ध नहीं मिल पा रही है जिससे अनगिनत असाध्य रोग मानव काया को ग्रसित कर रहे हैं । इन सभी भावों को बुन्देली के कवि श्री कल्याण दास साहू ’पोषक’ ने इस तरह व्यक्त किया हे ।
कितऊँ-कितऊँ तौ परतइ सूखा, कितऊँ आउतई बाढें ।
भीषण आंँधी तूफानन में, संकट खूबई बाड़ें ।
धरती डिगन लगी है अब तौ, हानि होय धन-जन की ।
रोको अन्धाधुन्ध कटाई, हरे भरे बिरछन की । 7
इतना ही नहीं कवि गुस्सा की भाषा में इसी कविता में आगे कहता है कि जो प्रकृति प्रदत्त वन संसाधन हैं, उन्हें आप नष्ट कर देगे तो भविष्य में सिर पकड़ कर मात्र पछताना शेष रहेगा और धरा मरुस्थल में परिवर्तित हो जाएगी इसीलिए इस स्थिति को रोकना है । वे लिखते हैं -
जो कछु है सो चाट लेव, फिर बैठे रइयों हींडत ।
करम पकर कैं बैठे रइयो, हाँत, आँख सिर मींड़त ।
भ्याँने सबै छानने पर है, खूब खाक गलियन की ।
रोको अन्धाधुन्ध कटाई, हरे-भरे बिरछन की । 8
हम सभी लोग यदि अपनी भलाई चाहते हैं तो खूब मन लगाकर वृक्षों की सेवा करें और खाली पड़ी पड़त भूमि में वृक्ष लगाकर धरा का श्रृंगार करें । वृक्ष जहां एक ओर पर्यावरण को शुद्ध बनाते है ं वहीं हमारे आर्थिक संबल भी बनते हैं । श्री नवलकिशोर सोनी ’मायूस’ अपनी एक बुन्देली रचना में वृक्षों के महत्व को बताते हुए लिखते है:-
पैल लगाए हते जे बिरछा अब फल दैन लगे हैं ।
वृक्षारोपण संे ओ भइया अपने भाग जगे हैं ।
खेतन की मेंड़न के ऐंगर जांँगा कछू डरी ती ।
उतईं लगाए हते जे बिरवा मेंहनत ऐंन करी ती ।
खाद और पानी सें इनके सब दुख दूर भगे हैं ।
तनक-तनक से रए जे जबलौं तबलौं इनैं समारो ।
दिन्नाँ रात तकै रए इनखाँ तनकउ दओं नईं टारो ।
ऐसें राखौ प्रैम इनन सें जैसे भाई सगे हैं ।
दो जोड़ी जामुन के पेड़े आठ लगे आमन के ।
इनके फल बेचें सें घर में ढेर लगे दामन के ।9
इस तरह बुन्देली काव्य में वृक्षों का आर्थिक महत्व नवल किशोर सोनी मायूस द्वारा बताया गया है । बुन्देलखण्ड धारा विभिन्न प्रजाति के वृक्षों से आपूरित है जिससे उसके प्राकृतिक सौन्दर्य अनुपम है । इस छवि का वर्णन करते हुए बुन्देली कवि डॉ. अवध किशोर जड़िया ने लिखा है -
कानन की छवि कौन कहै -
जहँ बेर मकोर की झेलम झेल है ।
तेंदू तहांँ बनराज तहैं-
यह कोनउँ खंड सौं नहीं पछेल है ।
गंध करौंद मधूक की है-
मदकारिनी मेखला पै नहिं मेल है ।
चारु अचार मिलें चहुँ ओर-
बिचार कहों यह भूमि बुंदेल है ।10
अतः हम पाते है कि बुन्देलखण्ड के महत्वपूर्ण वृक्ष महुआ, नीम, अचार, बेर, मकोर, निबुआ, जामुन आदि बुन्देली कवियांे की रचनाओं में न केवल आए हैं बल्कि उनके महत्व को भी बुन्देली कवियों ने पहचान कर लोक के समक्ष उनकी रक्षा का आव्हान भी किया है । अन्त में राई की धुन लिखी में जगदीश रावत की इन पंक्तियों में किए गए आव्हान से अपनी बात पूरी करते है -
बिरछा लगाव पेड़-पौदा लगाव, अपनो जौ जंगल न काटियो ।
इनखों न सताव हरियाली बढ़ाव, अपनौ जौ जंगल न काटियो ।
ई जंगल सें मिलत है, जीवै कौ वरदान ।
प्रानवायु औषद मिलै, वन है देव समान ।
देव के समान, वन देव के समान ।
अपनौ जौ जंगल न काटियों ।11
एम.आई.जी.-7 न्यू हाउसिंग
बोर्ड कॉलोनी, छतरपुर

1. ईसुरी की प्रामाणिक फागें, सं. डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त पृ.51, 2. ईसुरी की फागें, सं.घनश्याम कश्यम पृष्ठ 104,
3व4 लेखक के निजी संग्रह से 5 अक्षर अलख जगाये - जगदीश रावत पृष्ठ 50, 6. अक्षर अलख जगाये - जगदीश रावत पृष्ठ 50
7. पेाषक चेतना-कल्याण दास साहू ’पोषक’ पृष्ठ 29, 8. पेाषक चेतना-कल्याण दास साहू ’पोषक’ पृष्ठ 30,
9. रैवे इतेै देवता तरसें, नवलकिशोर सोनी ’मायूस’ पृष्ठ 23, 10 बन्दनीय बुन्देलखण्ड-डॉ.ए.के.जड़िया ’किशोर’ पृष्ठ 10
11. अक्षर अलख जगाये- जगदीश रावत पृष्ठ 61
डॉ.बहादुर सिंह परमार
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी विभाग)
शास.महाराजा स्नातकोत्तर स्वशासी
महाविद्यालय छतरपुर म.प्र. 471001




संत परम्परा के कवि महामति प्राणनाथ

संत परम्परा के कवि महामति प्राणनाथ 
-डॉ. बहादुर सिंह परमार
भारतीय इतिहास में संतों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक मानवता की निष्कलुष तथा निर्विवाद प्रतिष्ठा के लिए संतों ने जिस विवेकशील सम्यक् दृष्टि, उदारता, त्याग-तपस्या, स्नेह और सहनशीलता से काम लिया वह समाज के अन्य किसी वर्ग द्वारा संभव नहीं था । स्वार्थी, धर्मान्ध और अहंकारी समाज-व्यवस्थापकों तथा शास्त्रज्ञों से जिस सत्यनिष्ठा, संकल्प और साहस से संत संघर्ष कर सके, उस अपराजेय चारित्रिकबल तथा आत्मशक्ति की कल्पना अन्यत्र नहीं की जा सकती थी । भारतीय साहित्य का
मध्यकाल संतों की इसी महती भूमिका का काल है । जब देश अलगाववादी जाति-पांति, छुआछूत, सम्प्रदाय भेद, बाह्यावतार, शास्त्रीय पांडित्य के अहंकार, राजनैतिक विद्वेष, दुराग्रह और सामाजिक विवेकहीन व्यवस्थाओं से ग्रस्त होकर एक-दूसरे के लिए पीड़ा-उत्पात, अत्याचार और धार्मिक प्रताड़नाओं का अखाड़ा बना हुआ था असमर्थों पर मनमानी कर रहे थे, कोई किसी की सुनने वाला नही था, हिन्दू-मुस्लिम दो संस्कृतियाँ आपस में टकराकर धर्म के नाम पर अधार्मिकताओं और षड़यन्त्रों के नये जान बुन रहीं थीं उस समय इन्हीं सन्तों में उदार समन्वय के शीतल जल से धधकती ज्वाला को शांतकर रक्तपात और उत्पीड़न से जनजीवन की रक्षा तथा सामाजिक सौमनस्य के वातावरण की रचना का प्रयास किया था । कबीर, नानक, नामदेव, तुलसी जैसे अनेक सन्तों ने अपने सद्भावी स्वरों से जहाँ एक ओर जनमानस को जगाने की चेष्टा की वहीं दूसरी ओर साहित्य को भी समृद्ध किया । सन्तों की इसी श्रृंखला में महामति प्राणनाथ का नाम भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है । इन्होंने   अपनी बाणी से जनचेतना को बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है । इन्होंने  अपनी बाणी स जनचेतना को जागृत करने के साथ हिन्दी के भाषिक संसार को नया आयाम प्रदान किया ।
महामति प्राणनाथ ने निराश, खंडित, दलित तथा विश्रृंखिलत समाज को समेटने तथा सर्वधर्म समन्वित लोक आस्थाओं को स्थापित करने  तथा टूटे, उदास हृदयों को जगाकर खड़ा करने का अभिनव प्रयास किया । उनके इन प्रयत्नों ने पूर्ववर्ती सन्तों द्वारा किए सद्प्रयासों को नया आयाम व विस्तार दिया । कबीर ने जातिगत भेदभाव से ऊपर  उठकर हिन्दुओं तथा मुसलमानों को एक सूत्र में पिरोने का समतावादी आह्वान किया था जिसमें शास्त्रीय ज्ञान के अहंकार से ग्रस्त उच्च वर्ग के प्रति गुस्सा का स्वर प्रमुख था दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास ने शैव-वैष्णवों के लिए नया समन्यवयकारी स्वरूप प्रस्तुत कर सबको समान बनाने का पावन काम किया किन्तु इन एकता प्रयासों में कहीं न कहीे कुछ कमियाँ थीं परिणामस्वरूप कबीर और तुलसीदासं जैसे संतों की सैद्धातिक समरसता पूरी तरह स्थापित न हो सकी । स्वामी प्राणनाथ ने उस दुर्बलता को समझा और समस्या के तह में जाकर समाधान का प्रयत्न किया । उन्होंने इस तथ्य को अच्छी तरह से परख लिया था कि धर्म समाज की एकता में ही मानवीय कल्याण निहित है । यदि समाज को अलगाव, आतंक व विखंडन की अहंकारी रीति-नीतियों से नहीं बचाया गया तो मानवता का सर्वनाश निश्चित है इसीलिए उन्होंने देशी-विदेशी  सभी धर्मों को मिलाकर एकत्व की सदाशयी धवल पीठिका पर मानव धर्म को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया । उन्होंने मूल धर्मग्रंथों की विचारधाराओं और मूलभूत सिद्धांतों की ओर विचारकों का ध्यान खींचा । सभी अवतारी पुरुषों व संसार के धर्मग्रंथों की गुत्थियों को सुलझा कर कथानकों  की एकरूपता प्रतिपादित की ।
महामति प्राणनाथ के समय में औरंगजेब का शासन था जिसमें एक ओर तो उद्दंड क्रूर राज कर्मचारी धर्म की आड़ लेकर मनमाने अत्याचार कर रहे थे दूसरी ओर शोषित हिन्दू जन अपना ‘हिन्दू‘ नाम बचाने के लिए अपने ही में सिमटे जा रहे थे । ऐसे समय मंे प्राणनाथ जी ने हिन्दू, इस्लाम तथा ईसाई धर्म ग्रन्थों से उद्धरण देकर समझाया कि सभी धर्मों में मानवता, त्याग, प्रेम व करुणा ही मूल आधार है। वे कहते हैं-
जो कछु कहया कतेब ने, सोई कहया वेद।
दोऊ बंदे एक साहेब के, पर लड़त बिना पाये भेद ।
बोली जुदो सबन की, नाम जुदे धरे सबन ।
चलन जुदा कर लिया, ताथे समझ न परी किन ।। (खुलासा, 12-42, 43)
अर्थात् जो कुछ है कतेब ने कहा, वही वेदत कहता है । सभी तो एक ही स्वामी के बंदे हैं । केवल भाषा भेद के ही  कारण व्यर्थ के झगड़े हो रह हैं । सबकी बोलचाल की भाषा भी अलग-अलग है, भाषा के अनुसार लोगों ने अलग-अलग नाम भी रख लिए हैं । वातावरण के अनुसार के बने चलन को धर्म का आचरण मान लिया इसीलिए अब किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा है ।
महामति प्राणनाथ जी ने देखा कि न केवल हिन्दू-मुसलमान ही आपस में लड़ रहे है बल्कि हिन्दू-हिन्दू और मुसलमान-मुसलमानों में भी भेद है । यदि नहीं, सभी धर्म आपसी प्रतिद्वंदिता व स्वार्थपरता के कारण अपना मूल स्वरूप खो रहे हैं, तो उन्होंने कबीर की ही तरह दोनों धर्मो के जिम्मेदार कहलाने वाले लोगों को न केवल फटकार बल्कि उन्हें शाश्वत सत्य से परिचित कराते हुए रहा -
ब्राह्मण कहें हम उत्तम, मुसलमान कहें हम पाक।
दोऊ मुट्ठी एक ठौर की, एक राख दूजी खाक।। (सनंध 40/42)
ेे हिन्दू तुरक दोन ने गाये, तिन मिल के दोय पंथ चलाये।
खेंचा खेंच जगत में होई, एक अरथ मिलि कहत न कोई ।
इस परस्पर विग्रही दशा को देखकर तत्कालीन समाज अंर्तमुखी हो उदासीन हो गया था किन्तु इस उदसीन समाज को जनचेतना के सच्चे कवि प्राणनाथ ने न केवल वाणी से बल्कि अपने आचरण से झंकृत कर नई दिशा प्रदान की । उन्होंने पहले तो मुगल बादशाह  से मानवीय धर्म की सर्वकल्याणकारी राह पर चलने का आग्रह किया जो चाटुकार दरबारियों तथा अंहकारी मुल्ला-मौलवियों के कारण कारगर न हुआ । तत्पश्चात् देशाटन करके जनजीवन, धर्म तथा समाज की सुरक्षा के लिए पौरुषवान योद्धाआंे को अन्याय के प्रतिकार के लिए आगे आने का आवहान  किया -
राजा रे मलो रे राने रायतणां धरम जाता रे कोई दोड़ो।
ेजागो रे जोधा रे उठ खड़े रहो, नींद निगोड़ी रे छोड़ो ।।
परिणामस्वरूप अनेक सेठ-साहूकार, अनुयायी कार्यकर्ता और महाराज छत्रसाल जैसे योद्धाओं ने सामाजिक जीवन तथा राष्ट्रधर्म की रक्षा का संकल्प लिया । प्राणनाथ जी ने सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण कााल किया जनसमुदाय को जागृत करने का, उनके भीतर चेतना झंकृत करने का जो काम सही मायने में एक कवि व समाजचेता संत का होता है। उन्होेंने जागनी के माध्यम से यह बताया कि सारे धर्म एक हैं और उनका उद्देश्य मानव कल्याण ही है। विश्व क मनुष्य एक हैं। उनमें भेदभाव नहीं किया जा सकता । भेदभाव वरना धर्म विरुद्ध है। संसार के सारे धर्मों में पूज्य ईश्वर नाम व वाणी से अलग प्रतीत होते हैं। वस्तुतः वे सब एक हैं। यही नहीं, सारे सच्चे धर्म ग्रंथ भी एक ही बात कहते हैं। उन्होंने जंबूर, तौरेत, इंजील, कुरानशरीफ, बेद-कतेब,रामकृष्ण, ईसा-मुहम्मद बुद्ध को एक ही सिद्धकर ब्रह्मएकता तथा मानव मात्र के लिए एक धर्म का सिद्धांत प्रतिपादित किया । वे कहते हैं कि-
कलाम अल्ला या हदीसें, सास्त्र पुरान या वेद।
एकसब सुख लेवें मोमिन, हक रसना के भेद।। (सिंधी, 16-19)
वेद आया देवन पे, असुरन पे कुरान।
मूल मायने उलटाय के, कोई जाहेरी किये तूफान।।(खुलासा, 13-9 )
उन्होंने बताया कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला  चाहे हिन्दू हो या मुसलमान या कोई अन्य। वह कभी भी दूसरों को पीड़ित और दुःखी नहीं करेगा । हिंसा, रक्तपात,दुराचार,पाखंड धार्मिक लोगों के कार्य नहीें हैं। सच्चा धार्मिक वही है जिसकी आत्मा पवित्र है और आचरण शुद्ध है। वे कहते हैं-
हो भाई मेरे वैस्नव कहिए वाको, निर्मल जाकी आत्म।
नीच करम के निकट न जावे, जाए पेहेचान भाई या ब्रम्ह ।। (किरंतन, 911)
जो दुख देवे किनको, सो नाहीं मुसलमान।
नबिएं मुसलमान का, नाम धराया मेहरबान।। (सनंध 44/24)
इसी तरह प्राणनाथ जी ने मन की पवित्रता, दूसरों की सेवा, परोपकार तथा आपसी मानवीय प्रेम को सर्वोत्तम सिद्ध किया है। हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल से जो धारा मानवीय प्रेम तथा सामंजस्य की प्रवाहित हुई थी  उसी को और पवित्रता से प्रवाहित करने में प्राणनाथ जी का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने सच्चे संत व कवि के रूप में अपने जीवन अनुभवों को समाज के समक्ष रखा है। उन्हांेने  किताबी तथ्यों को जीवानानुभवों की प्रयोगशाला में डालकर  परखा और उनकी अंतरात्मा को छू सका उसे स्वीकार कर जनचेतना हेतु संदेश के रूप में सम्प्रेषित किया।
स्वामी प्राणनाथ ने शब्दातीत ब्रम्ह की बड़ी गंभीर तार्किक और विस्तृत व्याख्या की हैै । उनके अनुसार शब्दातीत ब्रम्ह को समझना जरूरी है । यह यदि हमारे समझ में आ जाए तो हमारे व पथ प्रदर्शकों के भ्रम सहज ही में दूर हो  सकते हैं। यह तो स्वयंसिद्ध और स्वानुभूत सत्य है कि जिसका हमने अनुभव किया है अथवा देखा है उसका यथावत् वर्णन वाणी अथवा शब्दों से संभव नहीं है। बहुत कुछ छूट जाता है । हमारी अपनी आत्मा ही कहने लगती है कि यह ऐसा नहीं है, यह वैसा नहीं है। इस प्रकार परम धाम में चिन्मय स्वरूप परात्म को जो सुख मिलता है वह आत्मा को  नहीं। जो आत्मा को अनुभव होता है वह जीव को नहीं । जो जीव को अनुभव होता है वह अन्तःकरण को नहीें । जो अन्तःकरण को सुख मिलता है वही इन्द्रियों के माध्यम से मन तक पहुँचता है।  अतः मन को उतना भी मिलना संभव नहीं। मन के सुख का वर्णन जिह्वा करती है। परात्म का जो सुख इतने सोपानों से हो होता हुआ जिह्वा तक आया वह भला वही सुख वैसे हो सकता है, वहीं रूप कैसे हो सकता है ? वैसा ही वर्णन नहीं हो सकता इसीलिए वह शब्दातीत अथवा वर्णनांतीत है। तभी तो उसे नेति-नेति कहा गया है। वहाँ शब्द, मन, बुद्धि, का प्रवेश ही नहीे हो सकता । सारा वर्णन ब्रह्माण्ड और पिंड के बीच का है जो नश्वर है। इसलिए भ्रमवश   वर्णना अलग-अलग होते हैं। अहंकार और झूठी प्रतिष्ठा के लिए सम्प्रदायों के प्रमुख अपने-अपने को महान् सिद्ध करने में लग जाते हैं । और अन्ततः स्वयं को ब्रम्ह बताने लगते हैं जबकि सबके पार परमधाम निवासी अक्षरातीत ब्रह्म उन्होंने स्वयं देखा तक नहीं इसीलिए धर्म और धर्म स्थापनाएँ विकृत-दूषित हो गई। फलतः जो धर्म सर्वकल्याण की प्रेरणा से उद्भूत हुआ था वह आत्मकल्याण के घेरे में घिर गए इसीलिए  हिंसाएँ हुई, अनर्थ हुए । यही सब देखकर स्वामी प्राणनाथ कहते हैं कि जो धर्माचार्य अपने को ब्रम्ह बताते हैं उन्होने न ब्रम्ह को देखा और न समझा । उस द्वारा को खोलने वाले ही ब्रम्ह के ज्ञाता कैसे हो सकता है ? उस द्वार को खोले बिना अक्षरातीत सत्य की अखंडलीला को जाना ही नहीं जा सकता । अज्ञान के कारण ही विकारों का जन्म होता है जो दुराचरण के कारण बनते हैं । उनका कहना है कि प्रभु कृपा से मैंने उस परम धाम की अखंडलीला को देखा व समझा है जो श्रीमद्भागवत में वर्णित है । श्रीमद्भागवत का लीलाधारी कृष्ण परमब्रह्म है जो अपनी अखंडलीला से सबको सुख प्रदान करता है । यह लीला अविनाशी है, चिरन्तन व निरन्तर है । यही तारतमवाणी का सार है ।
स्वामी प्राणनाथ अपनी विचारधारा में न तो पूरी तरह कबीर थे और न तुलसीदास/कबीर की दृष्टि प्रखर प्रहारक थी । वे अपनी दृष्टि के विपरीत हर विसंगति पर तीखा प्रहार करते थे । वहाँ खण्डन व नकार का भाव अधिक है जबकि तुलसीदास में स्वीकृति भावना की प्रधानता है । वे सगुण रूप के प्रेमी संत थे । उन्होंने पुराणों व निगमागम के साथ जो सूझा उसे संघर्ष को बचाते हुए प्रस्तुत कर दिया । उन्हें किसी से बुराई नहीं है किसी से संघर्ष नहीं है । प्राणनाथ जी न तो कबीर की तरह सीधे प्रखर प्रहारक है और न खंडन व नकार के हिमायती । वे संघर्ष बचाकर सबको समेटने के भी पक्षधर नहीं थे । उन्होंने बीच का मार्ग अपनाया । यही कारण है कि एक ओर जहाँ दिल्ली के शासक को समझाकर सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते है वहीं उसकी मनोवृत्ति व व्यवस्था की आलोचना भी करते हैं । वे एक ओर जहाँ स्पष्टवादी  थे वहीं उदारवादी भी । भारत भूमि को पवित्र और वैष्णव धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहकर भी उसकी विसंगतियां उघाड़ते थे । वैष्णव समाज में जाति भेद पर कठोर प्रहार करते हुए कहते है:-
सब जातें नाम जुदे धरे, और सबका खाविंद एक ।
सबको बंदगी याही की, पीछे लड़े बिना पाए विवेक ।। (खुलासा, 12/22)
जात एक खसम की, और न कोई जात ।
एक खसम एक दुनिया, और उड़ गई दूजी बात ।। (सनंध ,33-17 )
इस तरह वे एक परब्रह्म की जाति स्वीकार करते हैं और किसी की नहीं ।वे अन्य धर्मों की अच्छाइयों को लेकर वेद कतेब की एकता का सबल प्रतिपादन करते हैं -
ए बेबरा वेद कतेब का, दोनों की हकीकत ।
इलम एकै बिध का, दोऊ की एक सरत । (खुलासा 12/03)
मुहम्मद और कृष्ण को जिन तर्कों और परम्पराओं से वे एकाकार करते हैं वह उनकी मौलिक और साहसिक सूझबूझ ही थी । वे अथर्ववेद को सबका सार और मूल बताकर सारे धर्मों और धर्माचार्यों की दुर्बलताओं पर सीधा तर्क-वितर्क करते हैं । उनकी तर्क दृष्टि और स्थापनाएँ उनके समर्थ प्रगतिशील व्यक्तित्व तथा गम्भीर, उदार किन्तु सजग व्यावहारिक दृष्टि की परिचायक है ।
स्वामी प्राणनाथ एक प्रगतिशील चिन्तक व समानता पर आधारित मानवीय समाज संरचना के समर्थक हैं । समाज को जाति  वर्ण के भेद को उन्होंने नकार कर निर्मल मन की पवित्रता पर जोर दिया है । वे तथाकथित ब्राह्मणों को फटकारते हैं जिन्हेांने वेश बनाकर धर्म को कर्मकांड का रूप दे दिया तथा आजीविका का साधन बना लिया वे कहते हैं कि-
विप्र वेष बाहेर दृष्टि, षट कर्म पाले वेद ।
स्याम खिन सुपने नहीं, जाने नहीं ब्रह्म भेद ।।
उदर कुटुंब कारने, उतमाई दिखावे अंग।
व्याकरण वाद विवाद के, अर्थ करें कई रंग ।। (सनंध, 16/21-22)
इसी तरह पाखंडों, कर्मकांडों, कुरीतियों और आडम्बरों पर प्राणनाथ जी ने प्रहार किये है। वे मानते है कि परब्रह्म स्वामी किसी से ठगे नहीं जा सकते । चाहे कोई कितने भी कपट करने का प्रयास करें, वे सब जानते हैं । प्रत्यक्ष में जो झूठे पाखंडों में उलझे रहते हैं वे गहनतम अंधकार मंे रहते हैं । जो बाह्य शुद्धता पर ध्यान देकर बार-बार स्नान करते है उन्हें कबीर की ही भांति समझाते हैं -
अंदर नाही निरमल, फेर फेर नहावें बाहेर ।
कर देखाई कोट बेर,  तोहे न मिलो करतार ।।
(किरन्तन 32-1)
इसी तरह कुछ लोक केश बढ़ा लेते हैं या केश मुॅंड़वा लेते हैं । इससे कुछ नहीं होता, जब तक आत्मा की पहचान नहीं होती तब तक प्रपंचपूर्ण वेशधारण करना मात्र पाखंड है । ऐसे लोगों को शास्त्र वचनों का अर्थ नही सूझता, वे तो मात्र अहंकार में डूबे रहते हैं -
सास्त्र शब्द को अर्थ न सूझे, मत लिए चलत अंहकार ।
आप न चीन्हें घर न सूझे, यों खेलत माँझ अंधार । । (किरन्तन, 7/11)
महामति प्राणनाथ जी इस तरह पाखंड पर प्रहार करके मुक्ति के लिए स्वयं को पहचानने का आव्हान करते हैं ।  उनका मानना है कि सतगुरू के अनुसार अपने अन्तः करण में ही पर ब्रह्म का वास है । अतः उस ब्रह्म को समझे बिना मुक्ति का कोई उपाय नहीं है ।
यामंे अंतर वासा ब्रह्म का, सो सतगुर दिया बताय ।
बिन समझे या ब्रह्म को, और न कोई उपाय ।।  (किरन्तन 35/23)
इस तरह हम पाते है कि स्वामी प्राणनाथ ने सभी मानव धर्मों को एकाकार कर विश्व बंधुत्व का भाव जगाने का सफल प्रयास किया । उन्होंने सम्पूर्ण मानव समाज को कष्टों से मुक्त कराने के लिए सतत् साधना की । उनकी साधना से जहाँ समाज को नई दिशा मिली वहीं हिन्दी साहित्य समृद्ध दिया उनके काव्य में सच्चे मानव मूल्यों की स्थापना के साथ नई जीवन दृष्टि परिलक्षित होती है । वे प्रगतिशील चिन्तक व संवेदनशील रचनाकार के साथ संत काव्य परम्परा के महत्वपूर्ण कड़ी हैं । इन्होंने हिन्दुस्तानी भाषा में लिखकर हिन्दी भाषा का शाब्दिक संसार भी बढ़ाया है । ये मूलतः गुजरात के निवासी थे जिससे गुजराती, उर्दू तथा हिन्दी के मेल से हिन्दुस्तानी भाषा में देवनागरी लिपि में आपने सरलतम ढंग से अपनी वाणी प्रस्तुत की है । इनकी रचनाओं में कुछ बुन्देली शब्द भी देखने को मिल जाते हैं क्योंकि उन्होंने बुन्देलखण्ड को अपनी कर्मभूमि चुना था । महामति प्राणनाथ का मानना था कि हिन्दी भाषा सरल व सुगम है इसलिए जनसामान्य तक इसी के माध्यम से पहुंचा जा सकता है ।
बिना हिसाबें बोलियां, मिने सकल जहान ।
सबकों सुगम जानके, कहूँ हिन्दुस्तान ।।
बड़ी भाषा ये ही भली, जो सबमंे जाहेर ।
करना पाक सबन को, अन्तर माहें बाहेर ।। (सनंध, 1/13-14)
इस तरह स्वामी प्राणनाथ ने आज से तीन सौ वर्ष पहले हिन्दी को अपनाकर उसको राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का स्वप्न देखा था ।
डॉ.बहादुर सिंह परमार
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी विभाग)
शास.महाराजा स्नातकोत्तर स्वशासी
महाविद्यालय छतरपुर म.प्र. 471001







आज के संघर्ष में मददगार है- निराला साहित्य

आज के संघर्ष में मददगार है- निराला साहित्य
                                                                                                   - डॉ. बहादुरसिंह परमार 
                         आज समाज में जातिवाद, भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता, अर्थलोलुपता तथा आपसी ईर्ष्या द्वेष से गलाकाट वातावरण दृष्टव्य है । आज खानपान से लेकर बोलचाल तक हम पश्चिम की अन्धी नकल करने में संलग्न हैं । इसका प्रमुख कारण आर्थिक उदारीकरण तथा भूमण्डलीकरण को माना जा रहा है । उदारीकरण के नाम पर विदेशी पैसा ऋण के रूप में देश में आ रहा है जिससे अमीर-गरीब के बीच की खाई और अधिक चौड़ी होती जा रही है ।  आज मानव मानव के बीच दूरी बढ़ती जा रहीं हैं । मानव ही मानव शोषक बनकर सामने खड़ा है । इन विकट परिस्थितियों से संघर्ष करके मानवीयता को बनाये रखना समस्त मानव समाज का कर्त्तव्य है । संतुलित संघर्ष मनुष्य को व्यक्तित्व देता है । संतुलित संघर्ष हेतु साहित्य की श्रेष्ठ रचनायें अभिप्रेरित करती हैं । साहित्य ही मनुष्य को भीतर से सुसंस्कृत करता है । साहित्यिक क्षेत्र में बड़ा रचनाकार वह माना जाता है जिसकी रचनायें अपने समय को अतिक्रमित करके भविष्य में मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने में सहायक होती है । इस दृष्टि से तुलसी, कबीर तथा निराला हिन्दी के बडे़ रचनाकार हैं । इनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ तथा कल्पना के माध्यम से नए मूल्य-संसारों को गढ़ा गया है । निराला की रचनायें आज की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों में पूर्णतः हमें दिशा प्रदान करतीं हैं ।
                                    भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान रहा है  परन्तु उसमें कालान्तर मे जो विकृतियां आयीं उससे सामाजिक ढांचा चरमरा -सा गया है । आज वर्ण व्यस्था कर्म आधारित न रहकर जन्म आधारित हो गई है । फलतः जातिगत ऊँच नीच भाव जन्मा । आज के जातीय संघर्षों को विराम देने में निराला के प्रबन्ध प्रतिमामें व्यक्त किये गये यह विचार महत्वपूर्ण हो सकते हैं । वह लिखते हैं-अधिकार भोग पर मनुष्य मात्र का बराबर दावा है जो यह समझता है, हम बड़े हैं, हम छोटे न होंगे, उसे मनुष्य कहलाने में बड़ी देर है । जो यह समझता है बड़ा छोटा और छोटा बड़ा हो सकता है उसे यह मानने में भी कोई आपत्ति न होगी कि शूद्र भी कर्मानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बन सकते हैं ।”1 वर्णाश्रम धर्म की वर्तमान स्थिति पर निराला ने गहरा विचार मंथन करके अनेक बार जोर देकर कहा कि भारत वर्ष की तमाम सामाजिक शक्तियों का यह एकीकरण -कालशूद्रों और अन्त्यजों के उठने का प्रभात काल है । ...भारत वर्ष का यह युग शूद्र शक्ति के उत्थान का युग है और देश का पुनरुद्धार उन्हीं के जागरण की प्रतीक्षा कर रहा है ।“2  निराला ब्राह्मण और क्षत्रियों की वर्णोच्चता को सिर्फ ढोंग, मात्र रूढ़ि भारतीयता के अंधेरे में प्रकाश देखने की कोशिश से कुछ अधिक नहीं समझते थे ।”3 उनके अनुसार तो हर मनुष्य में ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र भाव हैं, मात्रानुसार यहांँ तक कि आसुरी और दिव्य भाव भी पर ये तर्क की बाते हैं । वास्तव में शिक्षित-से-शिक्षित ब्राह्मण और कायस्थ दूध और पानी की तरह नहीं मिल सकते । ब्राह्मण बनने का जादू सब पर चला हुआ है, यद्यपि पराधीन देश में तत्वतः एक भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य नहीं- सब शूद्रों में ही इतर विशेष हैं ।”4 इस प्रकार निराला वर्ण को कर्म आधारित स्थापित करने के पक्षधर है । वह मानते हैं कि श्रम विभाजन पर आधारित  सामाजिक व्यवस्था का कोई रूढ़िगत अर्थ नहीं होना चाहिए इसलिए उनका बिल्लेसुर बकरिहाका ब्राह्मण कलकत्ता जाकर छोटे-छोटे कार्य करता है और फिर गांव वापस आकर वणिककर्म करके अच्छा गृहस्थ बन जाता है ।5 निराला ने न केवल रचनाओं में वर्ण व्यवस्था को कर्म आधारित बनाने पर जोर दिया है अपने जीवन मंे भी उसे अपनाया । जनेऊ हो जाने के बाद पतुरिया के लड़कों के हाथ का पानी पीना जातिच्युत होने के लिए एक बड़ा सबूत था  किन्तु निराला जी ने बिना किसी भय के खुले आम पानी पीकर जातिगत रूढ़ि को तोड़ा और उसमें वीरता का अनुभव किया ।”6 अतः इस प्रकार निराला जी ने स्पष्टतः जातिवादी  वर्ण व्यवस्था का खण्डन करते हुए इससे मुक्त होने का संदेश दिया है । समकालीन समाज में हिन्दू और मुस्लिम के बीच भेद उत्पन्न करने की वोटों की गणितीय राजनीति की जा रही है, जिससे इन दोनों सम्प्रदायों के अनुयाइयों में दिली दरारंे उत्पन्न हो रही हैं । आजकल राजनैतिक अवसरवाद से प्रेरित हिन्दुत्व की एक व्याख्या और भी की जाती है जो एक धर्म को दूसरे धर्म के विरोध में प्रस्तावित करती है, जिसका कठमुल्लापन मनुष्य को मनुष्य के विरुद्ध खड़ा करता है, आस्था के मामले में वर्ग भेद पैदा करता है, विवेक और तर्क की नहीं  भावोद्वेलन की भाषा बोलता है और इस तरह भीड़ के मनोविज्ञान का उपयोग करते हुए अंध श्रद्धालुओं के सोच पर हावी होकर उन्हें अपनी गिरफ्त मंे ले लेता है और फिर इस समूह का राजनीतिक स्वार्थों और उपलब्धियों के लिए अपने पक्ष में उपयोग करता है ।”7 इस तरह का मॉडल निराला का नहीं है । उन्होंने 1930 में हिन्दूया हिन्दवीशीर्षक से एक सम्पादकीय में लिखा था । इसमंे उन्होंने हिन्दूशब्द के अतीत की ओर संकेत करते हुए स्पष्ट किया था कि यह शब्द प्राचीन अनेक संस्कारो, अनेक ऐतिहासिक, राजनीतिक घृणाओं और आपत्तियों से मिला हुआ दूसरों का दिया हुआ जातीय शब्द है ।”8 निरालाजी हिन्दुओं और मुसलमानों को भाई-भाई भारत देश का निवासी मानते थे । वे सुधाजनवरी -33 की संपादकीय में लिखते है-हिन्दुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे है । यदि फारस में वे बढ़े-चढ़े विचारों के हैं, रूस में उनका चोला बदल गया है, टर्की में उनका कुछ और ही रूप हो रहा है , तो कोई कारण नहीं कि यहांँ के मुसलमान भी हिन्दुओं के बढ़ते हुए विचारों और समाज-सुधारों को देखकर अपना सुधार न करें ।वे मानते थे कि हिन्दू और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाए । परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों, दोनों एक दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें ।”9 इससे ही दोनों सम्प्रदायों के लोगों में सौहार्द्र उत्पन्न किया जा सकता है । निराला की शिक्षा का यह सार तत्व है कि समाज में ऊँच-नीच का भेद मिटाकर, अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त होकर व्यापक मानवतावाद की भूमि पर हिन्दू और मुसलमान अपनी राष्ट्रीय एकता दृढ़ कर सकते हैं ।”10
                                    जातिवाद और सम्प्रदायवाद के अलावा आज देश में भाषावाद के नाम पर भी बड़ी समस्यायें खड़ी की जा रही हैं । संचार माध्यमों के विस्तार से पश्चिमी प्रभाव अपने पैर फैला रहा है । अँंग्रेजी भाषा के बाहुल्य के साथ  अँग्रेजी मानसिकता बढ़ रही है । जिसे नया भाषाई सामंतवाद कहा जा सकता है । निराला राष्ट्रीय एकता के लिए भाषा की एकता का होना आवश्यक मानते थे । निराला जवानी का एक ऐसा कवि है, जो राजनीति के लिए नहीं हिन्दी भाषा के लिए हिन्दी के अभिमान के लिए , कर्म के आत्म-सम्मान के लिए, हिन्दी के आत्म-सम्मान के लिए अपने समय के महान् व्यक्तियों से भिड़ते रहे ।11 वह हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए गांधीजी से भिड़े नेहरूजी से भिड़े । उनका राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को अपनाने का संघर्ष वास्तव में अंग्रेजी के विरुद्ध समस्त भारतीय भाषाओं की अधिकार-प्राप्ति का संघर्ष था ।”12 आज हमें आजाद हुए पचास वर्ष हो गये परन्तु भारतीय भाषाओं को अपना अधिकार हासिल नहीं हो पाया है । हमें अपने सांस्कृतिक राष्ट्रीय विकास के लिए निराला के भाषाई संघर्ष को आत्मसात करने की परम आवश्यकता है । आज वैयक्तिक स्वार्थों के कारण हम राष्ट्रीय व सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी सी साधे बैठे हैं । हमें निराला की तरह सत्य के लिए, राष्ट्रभाषा के लिए साहित्य के लिए ईमानदारी के साथ विद्रोह करने भिड़ने और लड़ने की महत् आवश्यकता अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत कल्याण, व्यक्तिगत हित को तहे-ताक रखकर है ।
                                    आज उदारीकरण और वैश्वीकरण के नाम से देश में पूँजीवाद को नंगानाच करने की छूट मिल रही है । इससे समाज में वर्ग-वैषम्य, गरीबी, पीड़ा, घुटन, निराशा आदि प्रवृत्तियां लगातार बढ़ रहीं हैं । पूँजीपतियों के निरन्तर शोषण के कारण समाज का शोषित वर्ग दुख, स्वार्थ और छल का शिकार हो रहा है । इस पूँजीवाद के विकट रूप से निराला ने वर्षों पहले आगाह करते हुए लिखा था कि पूँजीवाद के सिंहासन पर शासक रावण जितने ही ऊँचे उठेंगे, दैन्य की लंगूर पूँछ की कुंडली पर अंगद की तरह उतने ऊँचे पहुंचेगें ।”13 आज पूँजीवादी व्यवस्था के कारण ही अर्थलिप्सु मानव दोषों का आगार बन बैठा है । अर्थ प्राप्ति की अन्ध भावना के कारण आज मनुष्य अन्धा बन गया है ।
ंइससे मनुष्य के तन और मन में, उसकी कथनी और करनी में महान अन्तर आ गया है, जीवन में कृत्रिमता आ गई है  और मनुष्य बर्बर हो गया है । इस स्थिति को निराला ने अंधकारपूर्ण स्थिति माना है -
                                    “गहन है यह अंधकारा,
                                    स्वार्थ के अवगुंठनों से
                                    हुआ है लुष्ठन हमारा ।”14
                        इस अंधकारपूर्ण स्थिति से बचने के लिए हमें सजगता के साथ बढ़ना होगा । आपाधापी भरी जिन्दगी से निजात के लिए प्रेमही ऐसा भाव है, जो मानव मन को शांतिप्रदायक हो सकता है । प्रेम की यह विशेषता है कि वह अपने रस से हमें सिक्त कर देता हैं, और हम प्रेम-सागर में डूबकर अपने को भूल जाते हैं । निराला नयनों के नयनों से खिंचन को सौभाग्य और प्रेम की संज्ञा देते हैं । प्रेम की चरम परिणति के रूप में कवि कामना करता है -
                                                            “सकल चेतना मेरी होये लुप्त
                                                            और जग जाये पहली चाह।
                                                            लखूँ तुझे ही चकित-चतुर्दिक्
                                                            अपनापन मैं भूलँू ।”15
                        निराला प्रेम को आनन्ददायक अनुभूति और आत्मा का प्रकाश मानते हैं । इन के साहित्य में प्रेम तुल्यानुराग की भूमि से प्रस्फुटित होता प्रतीत होता है ।”16 तथापि इनके मन-मानस में प्रेमालम्बन के प्रति पूज्य भाव17 सदैव विद्यमान रहा । निराला साहित्य में व्यक्ति के मुक्त प्रेम की अभिव्यक्ति, उनकी कविताओं में ही नहीं वरन् उनकी कहानी और उपन्यास तक में सामान्य रूप से मिलती है । उनके प्रारम्भिक दो उपन्यासों- अलक और अप्सरामें प्रेम की सुधारवादी प्रवृत्तियाँ व्यक्त हुई है ।”18 इसी तरह के सुधारवादी, त्यागमय, पवित्र प्रेम की आज आवश्यकता है, जिससे मानव मन का चैन वापस आ सकता है ।
                        आज राजनैतिक रूप से हम प्रजातंत्र में रहते हैं परन्तु हमारे रहनुमाओं द्वारा वहीं अंँग्रेजों वाली फूट डालो राज करोतथा बरगलाकर शासन करने की नीति अपनाई जा रही है । आज के राजनेता अपना मतलब गांँठकर तत्काल आँखें फेर लेते हैं । लेकिन फिर भी उनका जाल ऐसा है कि लोग उसमें फंसते हैं । स्वार्थ के वशीभूत होने के कारण ही ऐसा होता है । अतः ऐसे लोगों की वास्तविकता -चाटुकार वृत्ति और टुकड़खोर प्रवृत्ति भी जनता को साफ-साफ समझनी चाहिए । ”19 निराला ने राजे ने अपनी रखवाली कीमें ऐसे चापलूसों और खुशामदियों को सहीं चित्र खींचा है -
                                                                        कितने ब्राह्मण आये
                                                                        पोथियों में जनता को बांधे हुए
                                                                        कवियों ने उसकी (राजाकी ) बहादुरी के गीत गाये
                                                                        लेखकों ने लेख लिखे
                                                                        ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे
                                                                        नाट्य कलाकारों ने कितने नाटक रचे
                                                                        रंगमंच पर खेले ।20
                        क्या आज कमोवेश यह स्थिति निर्मित नहीं हो गई है ? हमें आज ऐसे चाटुकारों और छद्म बुद्धि जीवियों को बेनकाब करने की प्रेरणा निराला से मिलती है । आज जनता को राजनीति के कलंकित चेहरे से रूबरू कराने की आवश्यकता है ।
                        निराला की तरह नवीनता की स्थापना में आज अदम्य साहस अपेक्षित है । परम्परा और रूढ़ि को तोड़ना नई सामाजिक संरचना के लिए अति आवश्यक है ।21 निराला जी ने सदैव साहस और कर्त्तव्य शीलता का परिचय दिया है । उन्होंने सदैव जड़ता का विरोध और नूतनता का स्वागत किया है । नई सामाजिक संरचना हेतु जीवन के सभी अंगों में व्याप्त पुरातनता की कारा को तोड़ने नवीन आदर्शों से मण्डित पवित्र गंगा-जल धारा को प्रवाहित करने का निराला जी का संदेश सदैव मानव जगत में ध्वनित होता रहेगा -
                                                                        “तोड़ो, तोड़ो, तोड़ों कारा
                                                                        पत्थर की, निकालो फिर
                                                                        गंगा जल धारा ।”22
                        निष्कर्षतः निराला जी के साहित्य का आधार समानता का सिद्धान्त है । समाज में वे मूल रूप से मानव की स्वतंत्रता, समानता और मौलिक चेतना के संस्थापक थे । हम उनके साहित्य से आज क संघर्ष भरे माहौल में लगातार आगे संघर्ष करते रहने की प्रेरणा पाते हैं । अतः आज के संघर्ष में मददगार है निराला का साहित्य ।

डॉ.बहादुर सिंह परमार
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी विभाग)
शास.महाराजा स्नातकोत्तर स्वशासी
महाविद्यालय छतरपुर म.प्र. 471001


एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या आतंकवाद

                       

                          एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या आतंकवाद          
        आतंकवाद का सामान्य अर्थ भय व आतंक का माहौल उत्पन्न करना है । आतंक का तात्पर्य उस दशा से है जिसमें कुछ व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह अपनी उचित या अनुचित मांगों को मनमाने के लिये घोर हिंसात्मक साधनों का प्रयोग करने लगते हैं । आतंकवाद का अर्थ राजनीति या अन्य कारणों से प्रेरित हिंसा, तोडफोड, आगजनी, विध्वंशक कार्यवाहियों, हत्याओं अथवा अन्य रूप से की गई अस्थिरता से लिया जाता है । अब यह निर्विवाद रूप से स्वीकारा जाने लगा है कि आतंकवाद एक आपराधिक कार्य है जो कि राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कानून क तहत निन्दनीय व निषिद्ध है ।
                        आतंकवाद कोई नई परिघटना नहीं है । इसके अतीत पर विचार करने पर पाते हैं कि इसका इतिहास कई सौ साल पुराना है । अपने इस लम्बे इतिहास में इसके चरित्र व स्वभाव में अनेक बदलाव आयें है। आरम्भ में आतंकवाद का प्रयोग राजसत्ता द्वारा अपने नागरिकों पर अपना दबदबा कायम रखने, उनको सत्ता के प्रति आज्ञाकारी बनाये रखने के उद्देश्य से हिंसा व आतंक का सहारा लेने के रूप में किया गया था । उस समय राजतंत्र ही संगठित हिंसा और आतंक के मुख्य स्रोत थे । बाद में राजतंत्रों के पराभाव, राष्ट्र-राज्यों के उदय, निरंकुश शासकों के विरुद्ध लोकतांत्रिक शक्तियों के संघर्ष तथा औपनिवेशक गुलामी के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति संग्रामों का युग आया । जहां कहीं भी सामन्तों और राजसत्ताआंे ने इसको रोकने की कोशिश की तो इसके प्रतिरोध में जबाबी हिंसा और आतंकवादी कार्यवाहियां शुरू हुईं । इस पृष्ठभूमि में संगठित तथा योजनाबद्ध आतंकवादी आन्दोलनों की शुरूआत हुई । प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात आतंकवाद की प्रकृति में बदलाव आया । इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अनेक ऐसे परिवर्तन हुऐ जिससे आतंकवाद को नया बल मिला । तीसरी दुनिया के अनेक देशों में चल रहे अलगाववादी-आतंकवादी आन्दोलनों ने आतंकवाद का सहारा लिया । कुछ संगठन राज्य की हिंसा और आतंक के खिलाफ हथियार उठाने को मजबूर हो गये ।
                        द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आरंभ हुऐ शीतयुद्ध ने आतंकवाद को और हवा दी । जिसके तहत आमने-सामने की लडाई की बजाय प्राक्सीबार को जन्म दिया । यह अपरोक्ष युद्ध ही आतंकवाद के प्रसार का प्रमुख कारण बना । आज आतंकवादी पहले से कहीं ज्यादा आधुनिक संचार उपकरणों और हथियारों की सहज उपलब्धता ने उनके नेटवर्क को विश्वव्यापी और अत्यधिक विध्वंसक बना दिया है । स्वचालित क्लासिकाव व  एके -47 या एके -46 रायफलों, राकेट लांचरों, स्ट्रिंगर मिसायलों व ग्रेनेड एवं आरडीएक्स उनको विश्वके हथियार बाजार में प्रचुरता से उपलब्ध हैं । आशंका तो यह भी है कि परमाणु, रासायनिक व जैविक हथियार भी उनकी पहुँच से बाहर नहीं हैं । इन सबने आज आतंकवाद को अत्यधिक खतरनाक व भयावह बना दिया है ।
                        आतंकवाद का सहारा आम तौर पर धार्मिक, जातीय या भाषायी समुदायों के द्वारा अपनी महत्वाकंाक्षाओं को प्राप्त करने के लिये भी लिया जाता है । वे समाज, देश अथवा विश्व में आतंक उत्पन्न कर अपनी मांगों के बारे में व्यापक जनमत तैयार करना चाहते हैं तथा अपनी ओर लोगों का ध्यान खींचना चाहतें हैं । इसके साथ हिंसा के माध्यम से सरकारों पर प्रभाव डालकर अपनी मांगों को पूरा करवाने का प्रयास करते हैं ।
                        वैसे आतंकवाद की शुरूआत साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व भ्रष्ट प्रशासन को उखाड़ फैकने के उद्देश्य से हुई थी किन्तु धीरे-धीरे इसका स्वरूप भयानक होता गया है । आज जेहादी लडाइयों, क्षेत्रीय विवादों, भाषायी व धार्मिक उन्मादों, जातीय गुटों ने आतंकवाद को अत्यधिक विनाशकारी बना दिया है । आतंकवाद को परिभाषित करने का प्रयास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई बार किया गया लेकिन अनेक मतभेद उभरकर सामने आये । आज आतंकवाद के संबंध में अनेक व्याख्यायें हैं । एक देश के लोग जिसे आतंकवाद की संज्ञा देेते हैं । दूसरे देश के लोग उसी कार्यवाही को आजादी की लडाई, दमन के विरुद्ध संघर्ष और अस्तित्व रक्षा के लिये कार्यवाही मानते हैं । हिंसात्मक आन्दोलन में लिप्त एक व्यक्ति को आतंकवादी की संज्ञा दी जाती है लेकिन अपने उद्देश्य  में सफल होने पर वही व्यक्ति देश भक्त बन जाता है । यूएनओ में भी आतंकवाद को लेकर विभिन्न मतभेद उभरकर सामने आये हैं । तीसरी दुनियां के अनेक देशों की मांग थी कि दमन से त्रस्त अल्पसंख्यक, धार्मिक व जातीय समुदायों द्वारा अपनी स्वाधीनता के लिये किये जिन देशों के विरुद्ध यह संघर्ष हो रहा था उन्होंने उक्त कार्यवाही को आतंकवाद की संज्ञा दी । इस प्रकार आतंकवाद के संदर्भ मंे विभिन्न अवधारणाऐं होने के कारण इसकी सर्वमान्य परिभाषा प्रस्तुत करना कठिन हो गया ।
                        आज संसार के मुख्य आतंकवादों समूहों मंे उत्तरी आयरलैण्ड की आयरिश रिपब्लिकन पार्टी, इटली की रैड ब्रिगेड, श्रीलंका का लिट्टे, फिलिस्तानी मुक्ति संगठन, इसरायल का मोशाद, भारत मंे जेकेएलएफ, खालिस्तानी कमांडो फोर्स , बब्बर खालसा गु्रप, उल्का, जैश-ए‘-मुहम्मद, पाकिस्तान के हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत-उल-अंसार, लश्कर-ए-तौयबा, जमात-उल-दावा प्रमुख हैं । अपहरण, बंधक बनाना, बम विस्फोट, घातक हथियारों द्वारा आक्रमण, हवाई जहाज तथा समुद्री जहाजों का अपहरण व विध्वंश, सामूहिक निर्दोष लोगों का हत्याकाण्ड व तोडफोड से सरकारों को अस्थिर करना आतंकवादियों के प्रमुख कार्य हैं । निरंतर बढते विमान  अपहरण की घटनाआंे व यात्रियों की असुरक्षा से एक गंभीर समस्या पैदा कर दी थी जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ  ;न्छव्द्ध ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ पारित कर घोषित किया है कि विमान अपहरण व यात्रियों को बंधक बनाना अंतर्राष्ट्रीय समाज के विरुद्ध एक गंभीर अपराध है । संयुक्त राष्ट्र ने सभी राष्ट्रों से अनुरोध किया है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में ऐसी आतंकी घटनाआंे को रोकने का हर संभव प्रयास करें, अपराधियों पर मुकदमा चलाने व दण्डित करने में कतई परहेज न करंे एवं आवश्यक हो तो ऐसे अपराधियों के प्रत्यार्पण में एक-दूसरे की मदद करें जिससे कोई आतंकवादी दण्ड से बच न सकें ।
                        संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने भी आतंकवाद को बडी गंभीरता से लिया है, एवं सभी प्रकार के आतंकवाद की निन्दा करते हुऐ विश्वव्यापी सरकारों से दिसम्बर 1989 को अपील की है कि वे आतंकवाद के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करें व इसके खात्में के लिये कठोर कदम उठायें । किसी दूसरे देश के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को संगठित न करंे, न प्रोत्साहन देते हुऐ सहायता करें, साथ ही उनमें शामिल न हों । आतंकवादियों को पकडने, उन पर मुकदमा चलाने तथा उन्हें प्रत्यावर्तित करने में एक-दूसरे की सहायत करें तथा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के कारणांे को समाप्त करने की दिशा में प्रयत्न करंे । नवम्बर 1990 मंे हुऐ सार्क देशों के शिखर सम्मेलन में भी एक प्रस्ताव परित कर आतंकवाद को समाप्त करने, आतंकवादियों पर मुकदमा चलाने व अपराधियों को प्रत्यार्पित करने पर बल दिया गया ।
                        आज आतंकवाद का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो गया है, जो एक चिन्ताजनक पहलू है । अपने स्वार्थांे की पूर्ति व शत्रु देश को हानि पहुंचाने के लिये पाकिस्तान सरीखे कुछ देश न केवल आतंकवादियों को शरण, प्रशिक्षण व अन्य प्रकार की सहायता देते हैं बल्कि इन प्रशिक्षित आतंकियों को दूसरे देशों मंे घुसपैठ भी कराते हैं । जहां ये हिंसा, तोड-फोड व आगजनी के द्वारा मासूम लोगों की जान लेते हैं । इस प्रकार आतंकवाद ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को तो प्रभावित किया ही है, साथ में राज्यों की एकता व सुरक्षा को अकल्पनीय खतरा पैदा हो गया है । आज पाक समर्थित आतंकवादी भारत मंे आतंक फैलाकर देश अस्थिर कर रहें हैं । गुजरात के अहमदाबाद, राजस्थान के जयपुर, आन्ध्र के हैदराबाद, दिल्ली तथा मुम्बई जैसे शहरों में इन दरिदों ने जो खून की होली खेलकर दहशत पैदा की है, वह केवल निंदनीय ही नही, घृणित भी है । वैसे भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून के क्वबजतपदम व ि भ्वज च्नेनपज अंतर्गत शत्रु की सीमा में घुसकर उनको मार गिराने व उनके प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट करने का अधिकार है । भारत सरकार ने पाकिस्तान के आतंकवाद में लिप्त होने के सारे प्रमाण विश्व के अनेक देशों के समक्ष रखे हैं जिससे पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बना हैं किन्तु अभी भी पाकिस्तान दिखावे की कार्यवाही आतंकी संगठनों के खिलाफ कर रहा है । वह उन्हें एक तरह से बचाने मंे ही जुटा है । आज पाकिस्तान आतंकवाद तथा अलगाववाद को बढ़ावा देकर भारत की अखण्डता व प्रभुसत्ता से खेल रहा है । प्रत्येक देश की सरकार का यह पहला कर्तव्य है कि ऐसी गतिविधियों को कुचलना प्रत्येक सरकार का कर्तव्य है किन्तु साथ-साथ यह भी कर्तव्य है कि आतंकवाद को पनपाने में सहायक अन्याय, घोर गरीबी, पीड़ाआंे, निराशाओं, भेदभावों को जड से खत्म करे जिससे आतंकवाद पैदा ही नही हो । क्योंकि आतंकवाद मानवता के विरुद्ध सबसे बडा शत्रु है । इसके खात्में के लिये हमें गैरबराबरी खत्म कर बराबरी से युक्त संसार रचने का यत्न करना होगा ।

- डॉ. बहादुर सिंह परमार
एम.आई.जी.-7, न्यू हाउसिंग बोर्ड कालोनी,

छतरपुर (म.प्र.)