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Saturday, 8 June 2013

बुन्देली लोक संस्कृति तथा कलाए

बुन्देली लोक संस्कृति तथा कलाए
-डॉ. बहादुर सिंह परमार
बुन्देखण्ड की लोक संस्कृति तथा कलाओं पर चर्चा करने से पहले बुन्देलखण्ड की भौगोलिक सीमा रेखाओं पर चर्चा करना समीचीन होगा । बुन्देलखण्ड अंचल की भौगोलिक सीमा के सम्बन्ध में विद्वानों ने अलग-अलग मत व्यक्त किये हैं किन्तु अधिकांश विद्वान इस मत का समर्थन करते हैं कि नर्मदा, चम्बल, यमुना तथा तमसा सरिताओं के मध्यक्षेत्र के भू भाग को बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सम्मिलित माना जाये । इसी मत को दृष्टिगत रखते हुए हम बुन्देलखण्ड अंचल की लोक संस्कृति को देखेंगे इस अंचल की भौगोलिक अवस्थिति दो राज्यों मध्यप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश में हैं । इसमें मध्यप्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, होशंगाबाद, दतिया आदि जिले आते हैं  तथा उत्तरप्रदेश के जालौन, झांसी, ललितपुर हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट तथा बांदा जिले आते हैं । इस अंचल को अतीत में चेदि, जेजाक भुक्ति, दर्शांण, जुझौति आदि नामों से पुकारा जाता है । इस अंचल की संस्कृति को ही बुन्देली लोक संस्कृति की संज्ञा दी जाती है । लोकसंस्कृति में उस अंचल के लोक दर्शन, जन सामान्य के आदर्श, विश्वास व रीति रिवाजों के साथ पर्व, संस्कार तथा मान्यतायें आदि समाहित रहती हैं । हर अंचल की लोक संस्कृति उसके लोकमानस तथा लोकाचरण से निर्मित होती हैं और लोकमानस तथा लोकाचरण तत्कालीन परिस्थितियों से क्रिया-प्रतिक्रिया कर आकार लेते रहते हैं । यही परिप्रेक्ष्य बुन्देलखण्ड में भी देखा जा सकता है । 
लोकदर्शन तथा लोक मूल्य:-
बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति को जानने के लिए पहले हम यहां के लोकदर्शन को देखें । यहां का लोकदर्शन ईश्वरीय सत्ता में अडिग आस्था रखने वाला है । इसी के साथ-साथ जगत को मिथ्या मानने की धारणा भी यहाँ है । यहाँ जगत को माया का रूप भी माना जाता है । इसी भावना की अभिव्यक्ति आप इस लोकगीत में देख सकते हैं -
’’निकर चलौ दैकें टटिया रे, अरे दैकें टटिया रे !
धंधे में लगन देव आग रे, निकर चलौ दैकें टटिया रे....... ।’’
बुन्देलखण्ड के लोक मन में कर्म के प्रति आस्था का भाव, वीरों का सम्मान तथा स्वाभिमान कूट-़कूट कर भरा है । यहाँ का लोक दर्शन मानवीयता का पक्षधर तथा मानव जीवन को अनमोल मानने वाला है । बुन्देलखण्ड में त्याग, तपस्या तथा परोपकार भी जीवन के लोकदर्शन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । लोकदर्शन से प्रभावित होकर ही लोक मूल्य बनते हैं । लोक मूल्य वे होते हैं जो लोक हितकारी होने के साथ लोक में स्वीकृत हो मान्यता प्राप्त कर लेते हैं । लोक मूल्य लोक जीवन का दिशा निर्देशन करने वाले होते हैं बुन्देलखण्ड के लोक मूल्य भी मानव जीवन आधारभूत तत्वों से ओतप्रोत हैं । ये युगीन मान्यताओं और आवश्यकताओं के अनुरूप अपना स्वरूप बदलते भी रहे हैं । यहाँ ’सत’ और ’पत’ लोक मूल्यों ने लोक संस्कृति की अस्मिता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । यहाँ भक्ति का लोकमूल्य जन जन में समाया हुआ है । आप सब जानते हैं कि ईश्वर भक्ति जाति पाँत तथा छुआछूत के भेदभाव को नहीं स्वीकारती है । यहाँ भक्ति का लोकमूल्य इतना व्यापक है कि उसमें पारिवारिक सम्बन्धांे, सामाजिक दयित्वों और राष्ट्रीय भावनायें समाहित हो गईं हैं । इसी ने लोक जीवन मंे उत्साह व उल्लास भर दिया है । बुन्देलखण्ड के लोकमूल्यों में भक्ति ने एक नई दीप्ति जगाई तथा नया दर्प उभारा जिससे सांस्कृतिक गौरव बढ़ने के साथ एकता का भाव सुदृढ़ हुआ बुन्देलखण्ड अंचल में भक्ति के साथ प्रेम, शांति, मनुष्यत्व तथा भाईचारे जैसे लोक मूल्य भी गहरे से अपनी पैठ बनाये है । 
स लोकधर्म:-
किसी भी अंचल की लोक संस्कृति के स्वरूप निर्धारण में वहां के लोक धर्म का सर्वाधिक योग होता है । लोक धर्म ही वह महासागर होता है जिसमें आचरण रूपी विभिन्न कल-कल करतीं नदियां एकाकार हो जातीं हैं । बुन्देलखण्ड में सभी धर्मों सम्प्रदायों व पन्थों के प्रति समन्वय का भाव देखने को मिलता है । यहाँ का आम आदमी जहाँ एक ओर राम और कृष्ण की उपासना करता है वहीं दूसरी ओर निराकार ब्रह्म की साधना करने वाले कबीर के पद भी गुनगुनाता है । वह शैव व शाक्य परम्पराओं को भी मानता है यहाँ हर हर महादेव के जयकारा लगाते हुए लोग भी मिलेंगे और मैया के दरबार में अपने दुःखों से निजात हेतु अभ्यर्थना करती हुई भीड़ भी मिलेगी । स्थानीय लोक देवों में कारसदेव, गौंड़ बब्बा, हरदौल, दूल्हा देव, बडे़ देव तथा सिद्ध बाबा की मड़िया आपको पूरे बुन्देलखण्ड में मिलेगीं । यहाँ देवी के विभिन्न रूप ढारे, पूजे जाते हैं । जिनमें शारदा माता, मरई माता, खेरे की देवी, शीतला मैया, फूला की देवी, आदि प्रमुख हैं । यहाँ का लोक धर्म समूह धर्मी रहा है । बुन्देलखण्ड के लोक धर्म में मानव मूल्यों को केन्द्र में रखा गया है । यहाँ लोक धर्म में ज्ञान परोपकार, दया, करुणा, क्षमा, जैसे तत्व गहराई से बैठे हैं । इसीलिए लोक कवि ईसुरी कहते हैं कि- 
’’दीपक दया धर्म को जारौ, सदा रात उजयारौ । 
धरम करंे बिन  करम खुलै न, बिना कुची ज्यौं तारौ ।। 
लोकाचरण:-
लोक आचरण संस्कृति के यथार्थपरक चित्र होते हैं । इसमें संस्कार, पर्व, खान-पान, रहन-सहन, लोक मान्यताऐं, लोकाचार आदि समाहित रहते है । बुन्देलखण्ड अंचल का लोक जीवन बहुआयामी तथा अनेक मामलों में विशिष्ट है । उदाहरण के लिए अन्य अंचलों में बेटी के पैर छूने की परम्परा नहीं है किन्तु बुन्देलखण्ड में पुत्री के पैर छूकर नारी शक्ति सम्मान किया जाता है । आयु में छोटी होने पर भी बुन्देलखण्ड में दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, बुआ-फूफा आदि सभी जेठे-बड़े इस परम्परा का निर्वाह करते हैं । इसी तरह बड़ा भाई अपनी छोटी बहिन के पैर छूता है पहले तो यह भी मान्यता थी कि जिस घर मुहल्ले या गाँव में पुत्री ब्याही हो उस जगह का जल अन्न आदि ग्रहण नहीं किया जाता था । यदि विवशता में अन्न,जल ग्रहण करते थे तो दूना डेयोढ़ा मूल्य अदा करने की लोक परम्परा रही है । बुन्देलखण्ड के लोक संस्कारों पर निगाह डाले तो हम पाते हैं कि जन्म से पूर्व संस्कार गर्भाधान से प्रारम्भ हो जाते हैं ।  जो मृत्यु के बाद पिण्ड दान तक चलते रहते हैं । वैसे इस अंचल में सोलह संस्कार प्रचलन में  हैं जिनमें प्रमुखतः गर्भाधान, पुंसवन, सीमान्तोनयन, जन्म, नामकरण, निष्क्रमण, पासनी, मुण्डन, कन्छेदन, उपनयन, पाटीपूजन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास तथा अन्त्येष्टि संस्कार आदि हैं । इनकी अपनी मान्यतायें हैं, अपने-अपने रिवाज हैं । उदाहरणार्थ- विवाह संस्कार से सम्बन्धित कुछ विशिष्ट मान्यतायें देखिये - सुदकरा चले जाने के बाद कन्यापक्ष के लोग अन्त्येष्टि में शामिल नहीं होते हैं । वर-वधू का कुआँ पर जाना वर्जित कर दिया जाता है । विवाह के पूर्व जिंस को आँगन में एकत्र करके उसकी पूजा की जाती है । जिसे यहाँ ’’सीदौ छुवाना’’ कहते हैं । मिट्टी, ईंधन, तथा कढ़ाई की पूजा की जाती है । इसी तरह विवाह में मण्डप के नीचे जब जेवनार बैठती है तो गारियां गाने की विशिष्ट परम्परा है इसमें स्त्रियां अटा पर चढ़कर वर के पिता, माता, फूफा, बहन, बहनोई तथा मामा आदि पर व्यंग्य किये जाते हैं । इसके अतिरिक्त बुन्देलखण्ड में रसोई बनाने वाली स्त्रियां पहली रोटी अग्रासन के रूप में गाय या कन्या के लिए निकाल लेती हैं तबे को खाली चूल्हे से नहीं उतारा जाता है । गर्म तवा पर पानी नहीं डाला जाता है । मृत्यु के बाद होने वाली शुद्धता में बिना पकौड़ी वाली कड़ी ही बनाई जाती है । 
स लोकपर्वः-
लोकपर्व जनमानस में उल्लास भरते हैं । बुन्देलखण्ड में लोकपर्व बारहों महीने होते हैं । जिनमें कुछ ऐसे हैं जो पूरे भारत देश के साथ मनाये जाते हैं । जिन में दिवारी, दशहरा, नौ दुर्गा, होली, राम नवमी, रक्षाबन्धन जन्माष्टमी आदि शामिल हैं  किन्तु कुछ ऐसे पर्व हैं जो इसी अंचल में विशिष्ट रूप से मनाये जाते हैं जिनमें नौरता या सुअटा, अकती, मामुलिया तथा बुड़की आदि प्रमुख हैं । मामुलिया बुन्देलखण्ड में बालिकाओं के द्वारा क्वांर के कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है ।  इसमें एक कंटीली टहनी लेकर उसे मौसमी फूलों से सजाया जाता है फिर उसे पड़ोस में दरवाजे दरवाजे जाकर लड़कियाँ प्रदर्शन करती हैं तथा घरों से बदले में अनाज या दान प्राप्त करती है ंयह सब मिलकर उसका उपयोग करती हैं । सुअटा अथा नौरता क्वांर महीने के शुक्ल पक्ष में प्रथमा से प्रारम्भ होता है जिसमें बालिकायें लोक चित्रकला, गायन, मूर्तिकला, आदि की शिक्षा प्राप्त करती हैं । इसके अंतिम दिन ढिड़िया निकाली जाती है । ’अकती’ बैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनायी जाती है । जिसमें देवलों को डबुलिया में लेकर कन्यायें वट का पूजन करने जाती हैं । इसी दिन कृषि कार्य का प्रारम्भ होता है । बुड़की मकर संक्रान्ति को कहते हैं । इस त्योहार पर तिल के लड्डुू, घुल्ला तथा अन्य तिल से बने व्यंजन आदि खाने की परम्परा है । मकर संक्रान्ति अर्थात् बुड़की पर नदियों, तालाबों, या झरनों के किनारे मेलों का आयोजन होता है । जिसमें बुन्देलखण्ड की नर, नारी, बच्चे सभी प्रसन्नता पूर्वक सम्मिलित होते हैं । 
स खानपान:-
बुन्देलखण्ड के खान पान पर दृष्टि डालने से हम पाते हैं कि यहाँ के व्यंजन पौष्टिक तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध अन्न तथा संसाधनों से निर्मित होते हैं । दैनंदिन जीवन के व्यंजन अलग हैं जिनमें रोटी, दाल तथा सब्जियंा हैं जबकि विशिष्ट अवसरों यथा- विवाह या त्योहारों के अलग व्यंजन हैं । विवाह के अवसर पर माँड़े, बरा के साथ पंचमेल मिट्ठाईयां बनाई जाती हैं । लड़की के विवाह में उसको देने के लिए गुना, खांकर तथा दिखनी के लड्डू अलग से बनाये जाते हैं ।  कार्तिक पूजन के अवसर पर लोल कुचईया, भिम्मगजा जैसे व्यंजन बनते हैं जिनको खाने हेतु बुन्देलखण्ड का जनमानस लालायित रहता है । बुन्देलखण्ड के विशिष्ट व्यंजनों में डुबरी, रसयावर, फरा, चीला, सतुआ, खींचला, कचरियां, खुरमा, मालपुआ, तसमई, सन्नाटौ, गुलगुला, मगौरा, गुझिया, पपरियां, ठड़ूला, सुरा आदि बहुत से हैं जो लोक को ने केवल हष्टपुष्ट रखते हैं । बल्कि  एक नया जीवन देते हैं । 
बुन्देलखण्ड की वेशभूषा में हम देखते हैं कि यहाँ पर पुरुष साफा, पगड़ी, अँगौछी , तौलिया या साफी का प्रयोग का प्रयोग सिर ढँकने के लिए करता है वैसे धोती कुर्ता वण्डी, अल्फा, पन्चा, फतुई, कमीच आदि पहनने का रिवाज है । तहमत, पेन्ट, बुशर्ट ने भी अपनी पैठ बना ली है । आदमी साधारणतः हाथ में लाठी डण्डा या कुल्हाड़ी लेकर चलता है । पैरों में फिचऊँ पनइयाँ पहनी जाती थी किन्तु अब प्लास्टिक के जूतों ने स्थान ले लिया है । औरतें, साड़ी ब्लाउज बच्चियां अंगौछा या सलवार कुर्ता पहनने लगीं हैं । 
बुन्देलखण्ड के लोग आभूषण प्रिय भी हैं यहाँ स्त्रियों से सम्बन्धित गहनों में जो प्रचलित हैं उनमें पैरों की उँगलियों में पहने जाने वाले अनौटा, चुटकी, छला, कटीला, गुच्छी, गैंदें, गुटिया, गरगजी, जोडुआ, पाँतें, पाँवपोश, बाँके, बिछिया, आदि प्रमुख है । उसी तरह पैरों के गहनों में अनौखा, कड़ा, गूजरी या गुजरिया, घुंघरू, चुल्ला, चूरा, छड़ा, छागल, छैलचूड़ी, झाँझैं, टोड़र, तोड़ा, पायजेब, पैजना, बाँके तथा लच्छा आदि हैं । कमर में करधौनी, बिछुआ, डोरा, पेटी आदि पहनने का रिवाज है । हाँथ की उँगलियों में छला, छाप, फिरमा, मुंदरी, अंगूठी, पहने जाते हैं । कौंचा में कंकन, कंगन, कोंचिया, कड़ा, गजरा, गुंजें, चुरियां, चूरा छल्ला, दौरी, बंगलिया, बेलचूड़ी पानफूल लाखैं आदि पहनने की परिपाटी है । बाजू में अनन्ता, बखौरियां खग्गा, बजुल्ला, बाजूबन्द तथा बहुँटा पहने जाते हैं । गले में कण्ठमाल, कण्ठी, कठला, खँगौरिया, गुलुबंद, चंद्रहार, टकयावर, ठुसी, ढुलनियाँ, तिदाना, बिचौली, मंगलसूत्र, लल्लरी, हार, सुतिया, तथा हँसली पहनी जाती है । कान में ऐरन, कनफूल कुण्डल, झुमका, झुमकी, कनौती, ढारें, तरकीं, बैकुण्ठी बाला, विचली, लाला, लोलक तथा बारी पहनी जाती है । नाक में कील, झलनी, दुर, टिप्पो, नथ-नथुनियाँ नकमोती, पुंँगरिया, बुलाख आदि पहनने की परम्परा है । यहाँ माथे को खाली नहीं रखा जाता है इसमें बूँदा, बैंदा, बैंदी, टीका, टिकली, लगाने का रिवाज है । सिर के आभूषणों में झूमर, बीज, सीसफूल या माँगफूल है । बेणी में भी चुटिया, छैलरिजौनी तथा बेणीफूल लगाये जाते हैं । पुरुष भी आभूषण धारण करते हैं । पुरुषों के आभूषणों में अँगूठी, कड़ा, कण्ठा, गजरा, गोप, जंजीर, तबजिया, मोतीमाल, कुण्डल, बारी आदि हैं । 
स लोक गायन:-
प्रत्येक अँचल में मानव हृदय की नैसर्गिक मूल भावनाआंे की सहज व स्फूर्तिजन्य अभिव्यक्ति लोक गायन के रूप में प्रकट होती हैं । बुन्देलखण्ड में भी लोकगायन लोककंठों से फूटकर लोकरंजन करता है । यहाँे लोकगीत तथा लोकगाथाएँ गायी जाती हैं । लोकगीत लोकमन की सामूहिक तरंगयुक्त अभ्ंिाव्यक्ति होती है । बुंदेलखण्ड के लोकगीतों में प्राचीन परम्पराओं से युक्त पीढ़ी-दर पीढ़ी का जीवनानुभव मुखरित होता हैं । यहाँ प्रत्येक पर्व, संस्कार तथा खेल गीतों से युक्त है । कोई ऋतु ऐसी नहीं जिसमें गीत न गाया जाता हो । महीनांे गीतों को गाकर बुन्देलखण्ड का आम आदमी अपना सुख दुख भरा जीवन जीता हैं । आषाढ़ में उरगिया गीत के साथ रिमझिम फुहार में भीगंता किसान उमंगित होकर ददरियॉ गाने लगता हैं । आल्हा के स्वर भी आषाढ़ से भादों तक गँूंजते है । आल्हा बुन्देलखण्ड की महत्वपूर्ण लोकगाथा है, जिसमें वीरत्व, त्याग, शौर्य के वर्णन के साथ ऊर्जा संचार करने की तीव्र क्षमता है । सावन महीने में कजली, भुजरियॉ, झूला के गीतों के साथ मेंहदीं व चपेटा के गीत लोक कंठों से निसृत होते हैं । राछरे, रसिया, मलारें, भी सावन में सुनाई देती है । ’मोरे राजा किवरियॉ खोलो रस की बूदें परी’’ लोकस्वरों में गूँजने लगता है । भादों में रसिया मलारें, राछारे के साथ मैराई छट के गीत, जल विहार के गीत तथा धान निदाई के गीत गाये जाते हैं । तीजा के गीत न केवल लोकरंजन करते है बल्कि सेवा व्रत के लिए प्रेरित करते है । क्वाँर महीने में मामुलिया, नौरता, लांगुरिया, भगतें गाई जाती हैं । कार्तिक महीने में तो पूरा बुन्देलखण्ड कतकारियों द्वारा लोक नाट्य का रंगमंच बना दिया जाता हैं । इस अँचल की महिलाएँ कृष्ण की गोपिकाएँ बनकर भक्ति भाव से आपूरित हो ’’बड़े भोर से दहीरा लेके आ जाऊगी।’ के गीत गाती है । दिवारी पर नृत्य के साथ लोकगायन होता है । अगहन माह में खरीफ फसल काटते हुए बिलवारी तथा पूस व माघ महीने में टप्पे व रमटेरा की तानें सुनाई देती हैं । फागुन ऋतु राज बसन्त का महीना होता हैं, जो उल्लास, उमंग व मस्ती से लोक को लबरेज कर देता हैं । इस दौरान फागों के माध्यम से श्रृंगार का रस बरसता है । चैत में दिनरी, वैशाख में अकती गीत आदि लोककंठ से फूटते है । इसी तरह जन्मोत्सव के अवसर पर चरूआ गीत से लेकर कुआँ पूजन तक के गीत बुन्देलखण्ड में प्रचलित हैं । पलना में झूला झुलाने के गीत, पासनी, मुण्डन एवं कन्छेदन के लोकगीत अंचल में प्रचलित हैं । विवाह जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार होता हैं । विवाह में सगाई से लेकर विदा तक के गीत गाये जातें हैं । लगुन लिखने, लगुन चढ़ने, सीदा छुवाने, मटयावने के गीतों के साथ माड़वा, मायने के अलग-अलग गीत हैं । तेल चढ़ाने, मैर की पूजा करने, चीकट चढ़ाने के माार्मिक गीतों के साथ ऊबनी, बारात निकासी के गीत भी हैं, चढ़ाव, भाँवरें तथा पांव पखराई के गीत हैं । मण्डप के नीचे बारातियों के खाना खाते समय गारियॉ गाने का प्राचीन रिवाज अभी तक कायम हैं ।  धान बुबाई, दूदा भाती, कंकन छुराई से लेकर कुँवर कलेऊ तथा विदा गीत बुन्देलखण्ड के विवाहांे में सुने जा सकते है । बुन्देलखण्ड अॅचल में प्रत्येक जातियों के अपने-अपने निजत्व को स्वीकारते हुए गीत है।ं इसी तरह बाल गीत तथा खेल गीत भी चलन में हैं । लोक कंठों से अनेक गाथाएँ भी गीतात्मक रूप से मिसृत होती हैं जिनमें आल्हा, हरदौल, सुदामा, कृष्ण जैसे पात्र लोक में अपनी पैठ बनाये हैं । 
स लोक नृत्य
बुन्देलखण्ड अंचल में लोक नृत्यों के माध्यम से जीवन का उल्लास प्रकट किया जाता हैं । इस अंचल के वनों में रहने वाले गौंड, बैगा तथा रावत आदिवासियों द्वारा कर्मा नृत्य किया जाता हैं । इसमें एक प्रकार सुआ नृत्य का भी होता है जिसमें स्त्रियाँ कानों में धान की बाली खोंसकर नाचती हैं तथा सुआ की उपासना करती हैं । इस नृत्य में केवल स्त्रियाँ भाग लेती हैं । इसी में जब स्त्री और पुरूष सम्मिलित नृत्य करते हैं तो उसे सम्मिलित नृत्य कहते हैं । आदिकालीन शिकारी युग की संस्कृति को मुखरित करने वाला शैला नृत्य किया जाता हैं । जिसमें हकवारों के समूह हाँका लगाने जैसी आवाजें निकालकर लाठी बजाते हैं, ढ़ोल बजाते हैं । उसी पर नृत्य होता है । इस नृत्य में पुरुष अपने हाथों में सूखी लकड़ी के तेल भीगे डन्डे लेकर एकत्र होते हैं । नाचने वालों में एक बरेदी तथा मौन धारण करने वाले पशु का स्वॉग भरने वाले होते हैं । यह कई प्रकार से नाचा जाता हैं। हरौला, भरौला, झुलनियॉ, बैठक, अटारी तथा शिकार नृत्य इसके भेद हैं । बुन्देलखण्ड में धोबी, चमार, बसोर, मेहतर, काछी, ढ़ीमर, अहीर, गड़रिया तथा कोरी आदि जातियों में रावला नाच किया जाता हैं । इसमें एक पुरुष औरत एवं दूसरा पुरुष विदूषक बनता हैं । हारमोनियम सारंगी, मृदंग, झींका, कसावरी तथा रमतूला आदि दूसरे प्रमुख वाद्य यंत्र हैं ।  
बुन्देलखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय लोकनृत्य राई हैं । यह होली के अवसर पर किया जाता था किन्तु अब बारहों महीने किया जाता है । इसमें मृदंग की थाप पर घ्ुंाघरू झनझना उठते हैं । इसमें नर्तकी के रूप में अधिकांशतः बेड़नियाँ नाचतीं हैं । पुरुष नर्तक मृदंग कमर में बाँधकर बजाते हुए नाचता हैं इसमें श्रंृगारपरक गीत (फाग) गाये जाते हैं जिस की तीव्र गति पर नृत्य किया जाता है। इसका संगीत भी तीव्र होता हैं जो उत्तेजना पैदा करता हैं । बुन्देलखण्ड में राई को देखने के लिए लोग कोसों पैदल जाते है । अब विवाह तथा विशेष अवसरों पर भी राई नृत्य का आयोजन किया जाने लगा हैं । बुन्देलखण्ड में ढ़ीमर जाति में ढ़िमरयाई नृत्य होता है । जिसमे वाद्य यन्त्र के रूप में सांरगी, लोटा आदि का प्रयोग होता हैं । घोषियों में कांडरा नृत्य प्रचलित है । कांड़रा फिरकी खा-खाकर नाचा जाता हैं जिस प्रकार मठा बिलोरने में कड़ौनिया (रस्सी) घेट-घेट कर घूमती हैं उसी प्रकार नाचने वाला फिरकी लेकर घूमता हैं जिससे इसे कांड़रा कहा जाता हैं । दीपावली के अवसर पर पशुपालक जाति अहीरों द्वारा दिवारी नृत्य किया जाता हैं । नर्तक फुंदनादार बंडी तथा रंग-बिरंगी जाँघिया पहनकर हाथ में मोर पंख लेकर नृत्य करते है । इसको लाठी लेकर तथा डड़ा ( लकड़ी का छोटा टुकड़ा ) लेकर भी नाचा जाता हैं । इसमें  गायक की टेर बड़ी आकर्षक होती हैं । वाद्य यंत्र के रूप में ढोलक, नगड़िया तथा रमतूला आदि का प्रयोग किया जाता हैं । 
इसके अलावा झिंझिया (ढ़िडिया) नृत्य क्वॉेर में बालिकाओं द्वारा किया जाता हैं। जवारे रखे जाते समय भक्तांे द्वारा देवी नृत्य किये जाते  हैं। पारिवारिक लोक नृत्यो में शिशु जन्म के समय बुआ द्वारा लाये गए बधाए के साथ चंगेर या बधाई नृत्य किया जाता हैं। इसमें ढोलक, रमतूला आदि वाद्य यंत्र होते हैं। इस अवसर पर बधाये तथा सोहरे गाये जाते हैं। विवाह में भॉवर भी रस्म पूरी होने पर कन्या पक्ष की महिलाएं जब बारात के डेरे पर लाकौर लेकर जाती थी तो उस समय मृदंग पर नृत्य किया जाता था और पुरूष कपोलांे पर गुलाल लगाते थे। इसे लाकौर नृत्य कहते थे। जो अब विलुप्तता की कगार पर हैं। चीकट तथा बहू उतारते समय भी नृत्य किए जाने की परम्परा भी बुन्देलखण्ड में रही हैं।
स लोक नाट्य
मन का बेग जब कथा बन प्रकट होता हैं, तो अन्तस की भावातिरेक तरंग, कायिक क्रियाआंे द्वारा, वाणी को सशक्त एवं प्रभावशील बनने हेतु हाव भाव के सहारे व्यक्त होती हैं। इन्हीं हाव भावों का प्रदर्शन लोक नाट्य कहलाता हैं। इनमें संगीत, अभिनय एवं थिरकन का त्रिवेणी जैसा संगम होता हैं। बुन्देली नाट्यों में धार्मिक, सामाजिक, संस्कारपरक, सामूहिक या वैयक्तिक जीवन की अनुभूतियाँॅ अभिव्यक्त होती हैं। धार्मिक लोकनाट्य में रामलीला तथा रासलीला प्रमुखतः चलन में हैं। कार्तिक मास में पूरा बुदेलखण्ड लोक नाट्य का रंगमंच बन जाता हैं । जब कतकारियाँ कृष्ण की गोपिकाएँ बनकर भक्ति भाव से रास रचाती हैं। धँधकायनों भी एक ऐसा ही लोकनाट्य हैं जिसमें कृष्ण के सखा व कृष्ण दही की मटकी तोड़ने का स्वाँग करते हैं। बुन्देलखण्ड में स्वाँग बहुत प्रसिद्ध लोक नाट्य हैं जिसमें नकल उतारी जाती हैं। होली के अवसर पर एक पुरुष औरत का वेश धारण करता हैं तो दूसरा रंग बिंरगा चेहरा रंग कर विदूषक बन जाता हैं। इस अवसर पर ये दोनांे श्रृंगारिक चेष्टाओं का अभिनय करके लोकंरजन करते हैं। पारी टोरने का स्वॉग बुन्देलखण्ड में चलन में हैं। यह भी होली के अवसर पर रचा जाता हैं। इसमें युवक व युवतियाँ (विवाहित व अविवाहित) दोनों भाग लेते हैं। रंग पंचमी के दिन शाम के समय खुले मैदान में मजबूत लकड़ी के लट्ठांे गाड़ा जाता हैं। जमीन से पन्द्रह-बीस फुट ऊँचे लट्ठे पर एक गुड की पारी बाँधी जाती ह। इस लट्ठांे को चिकना करने के लिए एक महीने से पहले तेल से रगड़ा जाता हैं। इसके बाद गाँव का प्रतिष्ठित व्यक्ति छैल-छबीले युवकांे को लट्ठे पर चढ़ने का आदेश देता हैं। फिर दस पन्द्रह युवतियॉ लाठी लेकर लट्ठे के चारों तरफ नाचती हैं। जब कोई युवक  साहस करके लट्ठे पर चढ़ता हैं तो युवतियाँ लाठियों से उस पर प्रहार करती हैं। इसके बावजूद कोई युवक लट्ठे पर चढ़ने में सफल हो जाता हैं और गुड़ की पारी को तोड़ लेता हैं तो सभी युवतियाँ उसे गुलाल लगाती हैं तथा उसके बाद वह विजयी युवक सभी युवतियाँ के कपोलों पर गुलाल मलकर उन्हें गुड़ खिलाता है।
क्वाँर में नवदुर्गा के समय बुन्देलखण्ड में कुंवारी लड़कियाँ सुअटा खेलती हैं। समापन रात्रि में ढिड़िया विसर्जन के समय औरतें एवं लड़कियाँ गौर के विवाह का स्वाँग रचती हैं। जिसके माध्यम से औरतें क्वारी कन्याआंे को नये जीवन जीने की कला से अवगत करातीं हैं । इसके साथ बुन्देलखण्ड में भाव खेलने का स्वांग, लुगया आदमी का स्वांग, भये बधाव व कुंआ पूजने का स्वांग, सास-बहू का स्वंाग, फकीर को स्वांग, डाँकू का स्वांग, घसियारे का स्वांग, कलुआ मेंहतर का स्वांग, अहीरो का स्वांग तथा ढीमरांे का स्वांग आदि खेले जाते हैं। इन सवांगो के कथानक व्यंग्यपरक होते हैं। संवाद पैने तथा अभिनय क्षमता गजब की प्रभावी होती हैं। इसके अलावा बाबा (जुगिया) विवाह के अवसर पर वरपक्ष से बारात जाने पर स्त्रियो द्वारा खेला जाता हैं। जिसके माध्यम से विभिन्न शिक्षाएँ प्रदान की जाती हैं, जो जीवन परक व उपयोगी होती हैं।
मूर्ति तथा चित्रकलाएंॅ:-
बुन्देलखण्ड अँचल में मिट्टी, पीतल, पत्थर तथा गोबर की मूर्तियाँ गढ़ने की परम्परा हैं। यहाँ गणेश चतुर्थी को महिलाएँ गोबर के गणेश बनाकर पूजती हैं। दीपावली तथा होली के वाद गोवर से बनी दोजे  रखी जाती हैं, जो मूर्ति कला का जीता जागता नमूना होती हैं। इसके साथ दीपावली कें बाद प्रथमा को गोबर्धन थापे जाते हैं, यह भी गोवर से बनते हैं। मिट्टी से गौर, महालक्ष्मी का हाथी आदि बनाने की परम्परा हैं। यहॉ के कुम्हार मकरसंक्राति के अवसर पर पूजी जाने वाली मिट्टी के घुड़ला (घोड़ा) बनाते हैं। कुम्हारों द्वारा विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाआंे के साथ पुतरा पुतरियाँ भी बनाई जाती हैं। मिट्टी के अतिरिक्त पीतल की मूर्तियाँ श्रीनगर, छतरपुर, टीकमगढ़, ललितपुर तथा झाँसी आदि स्थानों पर बनाई जाती है। पत्थर को मूर्तियाँ गढ़ने में गौरा (संगमरमर) पत्थर का उपयोग किया जाता हैं। इसके अलावा बलुआ पत्थर व ग्रेनाइट पर भी अनेक मूर्तियाँ मिलती हैं।
बुन्देली जनमानस में चित्रकला रची बसी हैं। यहाँ विभिन्न तीज-त्यौहारों पर महिलाएॅ अपनी लोक चित्रकला का प्रस्तुतीकरण करती हैं। सभी मांगलिक कार्यांे तथा त्यौहार व पर्वों पर पूजा के पहले कनक (गेहँू का आटा) से चौक पूरे जाते हैं, जो वर्गाकार, आयताकार तथा त्रिभुजाकार होते हैं। पूजा के बाद चौक को आँचल के छोर से मिटाया जाता हैं। अल्पना व सुरॉती के अवसर पर इसका विशेष महत्व होता हैं। भित्ति चित्रों में सूर्य, चन्द्रमा का अॅकन तथा ऊका बनाना प्रमुखता से देखा जाता हैं। साँतिया, कलश, पशु-पक्षी एवं पेड़-पौधो को भी गेवरी (लाल मिट्टी ) या रंगांे से बनाया जाता हैं। विवाह के अवसर पर हल्दी व चूना के हाथे (थापे) लगाये जाते हैं। मेंहदी तथा महावर के माध्यम से विभिन्न बेल बूटे आदि चित्रात्मक ढंग से अंकित किए जाते हैं। लोक अंँचल में आँगन को गोबर से लीपा तथा सफेद पोतनी मिट्टी से पोता जाता हैं।
अतः हम देखते हैं कि बुन्देलखण्ड अँचल का जनमानस जीवन मूल्यों को आत्मसात करके लोेक कलाओं के माध्यम से अपने आप को अभिव्यक्त करता हैं जो न केवल लोक रंजक होता हैं बल्कि जीवन में शिक्षाप्रद भी होता हैं।

-एम.आई.जी.-7, न्यू हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, 
छतरपुर (म.प्र.)-471001 


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